मोबाइल फोन : साल, दो साल का साथी, फिर बनता बहुआयामी बर्बादी
-डॉ. शैलेश शुक्ला आज से दस साल पहले फोन का मतलब सिर्फ कॉल और संदेश था , पर आज सुबह के अलार्म से लेकर रात तक हमारी पूरी जिंदगी इसी छोटे से डिब्बे में बंद है। उसी में हमारा बैंक है , बच्चों की पढ़ाई है , दुकान का हिसाब है , जमीन के कागज हैं और परिवार की यादें भी हैं। पर कभी सोचा है कि जिस चीज पर इतनी बड़ी जिंदगी टिकी है , उसकी उम्र कौन तय करता है ? हम या उसे बनाने वाली कंपनी ? अगर आप ध्यान से देखेंगे तो पाएंगे कि उसकी उम्र हम नहीं , कंपनी तय करती है। आप तीस-चालीस हजार का फोन लाते हैं , पहले साल वह मक्खन जैसा चलता है , दूसरे साल भी ठीक रहता है , पर दूसरे साल के आखिर में ही संकेत मिलने लगते हैं। कंपनी कहती है अब इस मॉडल को बड़ा अपडेट नहीं मिलेगा , फिर कुछ महीनों बाद सुरक्षा अपडेट भी बंद हो जाते हैं। फोन गर्म होने लगता है , बैटरी जल्दी खत्म होती है , बैंक का ऐप कहता है आपका सिस्टम पुराना और असुरक्षित है। नया कैमरा फीचर आपके फोन में आता ही नहीं। मन में डर बैठ जाता है कि फोन बेकार हो गया और आप मजबूरी में ...