दिनकर ने जिस सामाजिक पाखंड की ओर संकेत किया था, वह आज भी प्रासंगिक
डॉ उमेश शर्मा *“जाति-जाति रटते जिनकी पूँजी केवल नाम,* *मैं क्या जानूँ जाति, जाति हैं ये मेरे काम।”* — रामधारी सिंह दिनकर भारत विविधताओं का देश है—भाषा, धर्म, संस्कृति और परंपराओं का अद्भुत संगम। लेकिन इसी विविधता के बीच एक गहरी सामाजिक बुराई भी मौजूद है, जो समय-समय पर देश की प्रगति में बाधा बनती रही है—जातिवाद। रामधारी सिंह दिनकर ने जिस सामाजिक पाखंड की ओर संकेत किया था, वह आज भी उतना ही प्रासंगिक है। हम आधुनिकता और समानता की बातें तो करते हैं, लेकिन व्यवहार में जाति आधारित भेदभाव अब भी कायम है। बाहरी आवरण बदल गया है, पर मानसिकता में परिवर्तन अधूरा है। *राजनीति और जातिवाद का गठजोड़* लोकतंत्र का उद्देश्य समाज को एक सूत्र में बांधना होता है, लेकिन वर्तमान राजनीति में जाति एक प्रभावी चुनावी समीकरण बन चुकी है। “अति पिछड़ा”, “पिछड़ा”, “अनुसूचित जनजाति (ST)” जैसी श्रेणियाँ, जो सामाजिक न्याय के लिए बनाई गई थीं, कई बार वोट बैंक की रणनीति में बदल जाती हैं। संसद और सार्वजनिक मंचों पर इस विषय पर चर्चा तो होती है, लेकिन ठोस और दीर्घकालिक समाधान अक्सर अधूरे रह जाते हैं। राजनीतिक दल जातीय...