ALL Crime Ministries Science Entertainment Social Political Health Environment Sport Financial
जल प्रबंधन समस्या एवं समाधान        
August 10, 2019 • Dr Dinesh prasad Mishra

जल प्रबंधन समस्या एवं समाधान                                                                       
डां.दिनेश प्रसाद मिश्र 

जल ही जीवन है', उक्ति जीवन में जल के महत्व का प्रतिपालन  भली-भांति करती है। जीवन में उसके महत्व को देखते हुये शुद्ध जल की पर्याप्त उपलब्धता अत्यंत आवश्यक है। जल की उपलब्धता की दृष्टि से भारत एक जल समृद्ध देश है ,जिसमें कल-कल करती नदियां जल की अपार राशि को अपने अंक में समाए हुए उसे सहज रूप में उपलब्ध कराती हैं, किंतु नदियों के संरक्षण संवर्धन एवं उनके अविरल प्रवाह को बनाए रखने हेतु सरकार की कोई नीति -योजना न होने के कारण  नदियां, वैज्ञानिक प्रगति ,अधा -धुंध शहरीकरण एवं तथाकथित राष्ट्रीय विकास के नाम पर किये जा रहे  कार्यों से प्रभावित होकर निरंतर प्रदूषित ,जलहीन एवं अस्तित्व हीन होती जा रही हैं। देश की बड़ी- बड़ी नदियां तो किसी न किसी रूप में आज अभी अपना अस्तित्व बचाए हुए हैं, किंतु उनको जल की आपूर्ति करने वाली 45 00 से अधिक छोटी-छोटी नदियां सूख कर विलुप्त हो गई हैं। साथ ही जल के उचित प्रबंधन और उससे संबंधित सही योजनाओं के न होने के कारण देश की बड़ी आबादी को आवश्यकता के अनुसार जल उपलब्ध नहीं हो पा रहा है। जल की अनुपलब्धता किसी मौसम विशेष में न होकर वर्ष पर्यंत बनी रहती है ,यह अलग बात है कि गर्मी के दिनों में जल की कमी अधिक होती है तथा वर्षा के आते ही उसमें कुछ राहत मिल जाती है ।  आज जल प्रबंधन राष्ट्र एवं सरकार के समक्ष एक बड़ी समस्या है ,जिसके सुनियोजित उपक्रम से देश में उपलब्ध जल की अगाध राशि का उपयोग सुचारू रूप से कर जल संकट से निदान पाया जा सकता है।द वर्ल्ड रिसर्च इंस्टीट्यूट की रिपोर्ट के अनुसार भारत सहित 17 अन्य देशों में पानी की समस्या अत्यंत गंभीर है। यह समस्त देश गंभीर जल संकट का सामना कर रहे हैं ,अगर इस समस्या पर शीघ्र ध्यान नहीं दिया जाता तो इन देशों में पानी की एक बूंद भी नहीं बचेगी। डब्ल्यू आर आई ने  भूजल भंडार और उसमें आ रही निरंतर कमी ,बाढ़ और सूखे के खतरे के आधार पर विश्व के 189देशो को वहां पर उपलब्ध पानी को दृष्टि में रखकर  श्रेणी बद्ध किया है। जल संकट के मामले में भारत विश्व में 13वें स्थान पर है ।भारत के लिए इस मोर्चे पर चुनौती बड़ी है, क्योंकि उसकी आबादी जल संकट का सामना कर रहे अन्य समस्याग्रस्त 16 देशों से 3 गुना ज्यादा है। रिपोर्ट के अनुसार भारत के उत्तरी भाग में जल संकट भूजल स्तर के अत्यंत नीचे चले जाने के कारण अत्यंत गंभीर है। यहां पर जल संकट  'डे जीरो' के कगार पर है,इस स्थिति में नलों का पानी भी सूख जाता है। विगत दिनों बंगलौर एवं चेन्नई में यह स्थिति उत्पन्न हो गयी थी।कम हो रही वर्षा तथा निरन्तर गिरते भूगर्भ जल स्तर को देखते हुये निकट भविष्य में सम्पूर्ण भारत, विशेष रूप से उत्तर भारत में पानी की अत्यन्त कमी अतिशीघ्र होने वाली है, जिसे भांपकर ही प्रधानमंत्री मोदी ने द्वितीय बार शपथ ग्रहण करने के पश्चात अपनी पहली 'मन की बात 'में जल समस्या से निजात पाने के लिए जल संरक्षण हेतु जनान्दोलन चलाने की बात कही है। आज देश के अनेक भागों में जल की अनुपलब्धता के कारण आंदोलन और संघर्ष हो रहे हैं।दक्षिण भारत के चेन्नई से लेकर उत्तर भारत के अनेक शहरों में पेयजल की समस्या मुंह बाए खड़ी है। देश के लगभग 70% घरों में शुद्ध पेयजल उपलब्ध नहीं है ।लोग प्रदूषित पानी पीने के लिए बाध्य हैं,जिसके चलते लगभग 4 करोड़ लोग प्रतिवर्ष प्रदूषित पानी पीने से बीमार होते हैं तथा लगभग 6 करोड लोग फ्लोराइड युक्त पानी पीने के लिए विवश हैं। उन्हें पीने के लिए शुद्ध जल उपलब्ध नहीं है। देश में प्रतिवर्ष लगभग 4000 अरब घन मीटर पानी वर्षा के जल के रूप में प्राप्त होता है किंतु उसका लगभग 8% पानी ही हम संरक्षित कर पाते हैं, शेष पानी नदियों ,नालों के माध्यम से बहकर समुद्र में चला जाता है।  हमारी सांस्कृतिक परंपरा में वर्षा के जल को संरक्षित करने पर विशेष ध्यान दिया गया था, जिसके चलते स्थान स्थान पर पोखर ,तालाब, बावड़ी, कुआं आदि निर्मित कराए जाते थे , जिनमें वर्षा का जल एकत्र होता था तथा वह वर्ष भर जीव-जंतुओं सहित मनुष्यों के लिए भी उपलब्ध होता था,  किंतु वैज्ञानिक प्रगति के नाम पर इन्हें संरक्षण न दिए जाने के कारण अब तक लगभग 4500 नदियां तथा 20000 तालाब झील आदि सूख गई हैं तथा वह भू माफिया के अवैध कब्जे का शिकार होकर अपना अस्तित्व गवा बैठे हैं। देश की बड़ी-बड़ी नदियों को जल की आपूर्ति करने वाली उनकी सहायक नदियां वैज्ञानिक प्रगति के नाम पर अपना अस्तित्व गवा बैठी हैं,जो कुछ थोड़े बहुत जल स्रोत आज उपलब्ध हैं,उनमें से अनेक औद्योगिक क्रांति की भेंट चढ़ चुके हैं ।फलस्वरूप उनके पानी में औद्योगिक फैक्ट्रियों से निकलने वाले गंदे पानी कचड़े के मिल जाने से उन का जल इतना प्रदूषित हो गया है कि उसको  पीना तो बहुत दूर स्नान करने पर भी अनेक रोगों से ग्रस्त हो जाने का खतरा विद्यमान है। देश की सबसे पावन नदी गंगा कुंभ के अवसर पर भले ही स्नान योग्य जल से युक्त रही हो ,किंतु आज वह फैक्ट्रियों के कचड़े एवं उनके छोड़े गए प्रदूषित पानी के प्रभाव से गंदे पानी की धारा बन गई है , जिस में स्नान करने से पूर्व श्रद्धालु से श्रद्धालु व्यक्ति को भी अनेक बार सोचना पड़ जाता है। भारत की कृषि पूर्णतया वर्षा जल पर निर्भर है। वर्षा पर्याप्त होने पर सिंचाई के अन्य साधन सुलभ हो जाते हैं किंतु वर्षा न होने पर सभी साधन जवाब दे देते हैं और कृषि सूखे का शिकार हो जाती है। चीनी उत्पादक महाराष्ट्र एवं उत्तर प्रदेश के किसान निरंतर गन्ने की खेती पर बल दे रहे हैं और सरकार भी गन्ना उत्पादन के लिए उन्हें प्रोत्साहित कर रही है ।इसी प्रकार धान की खेती के लिए पंजाब छत्तीसगढ़ उत्तर प्रदेश इत्यादि अनेक राज्य धान की फसल का क्षेत्रफल निरंतर बढ़ाते जा रहे हैं किंतु उसके लिए पानी प्राप्त न होने के कारण वह पानी भूगर्भ से निकाल कर खेतों को सींचा जा रहा है जिससे भूगर्भ में स्थित जल का स्तर निरंतर गिरता जा रहा है, जिस ओर कोई ध्यान नहीं दे रहा और पानी की समस्या निरंतर बढ़ती जा रही है।, स्पष्ट है कि जल प्रदूषण के अनेक स्रोत हैं जो सामूहिक रूप से जल को प्रदूषित करते हैं। इनमें प्रमुख हैं शहरीकरण के परिणाम घरेलू सीवेज, अनियंत्रित तथा हरित क्रांति के परिणामस्वरूप पानी पर अवलंबित खेती एवं औद्योगिक अपशिष्ट तथा कृषि कार्यों में अत्यधिक प्रयोग में लाए गए कीटनाशक ,जल में घुल मिलकर भूगर्भ के जल को  अत्यधिक मात्रा में प्रदूषित कर रहे है ,जिससे निजात पाने के संदर्भ में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने चुनाव प्रचार के दौरान यह घोषणा की थी कि पुनः सत्ता में आने पर खेती को पानी तथा हर घर को सन 2024 तक नल  के माध्यम से पीने का पानी उपलब्ध कराया जायेगा, जिस को दृष्टि में रखते हुए हर खेत को पानी के साथ हर घर को भी नल के माध्यम से पेयजल उपलब्ध कराने तथा सूख रही नदियों को पुनर्जीवित करने, नदियों में विद्यमान प्रदूषण को समाप्त करने तथा स्वच्छ जल स्रोतों को पुनर्जीवित करने ,के उद्देश्य से जल शक्ति मंत्रालय का गठन किया गया है, जल शक्ति मंत्रालय द्वारा जन सहयोग के साथ सरकारी व्यवस्था के अंतर्गत जल संरक्षण योजना को मूर्त रूप देने का कार्य विचाराधीन है ।संभव है वह निकट भविष्य में मूर्त रूप ले।
पानी की गंभीर समस्या को देखते हुए आज जल संरक्षण हेतु जन आंदोलन की प्रबलआवश्यकता है क्योंकि पानी की कमी से प्रभावित होने वाले क्षेत्र की सीमा निरंतर बढ़ती ही जा रही है। इसके अलावा और कोई रास्ता नहीं है कि पानी बचाने के लिए और उसे सुरक्षित करने के लिए हरसंभव उपाय किए जाएं। प्रधानमंत्री का मानना है कि देशवासियों  के सामर्थ्य ,सहयोग और संकल्प से  मौजूदा जल संकट का समाधान प्राप्त कर लिया जाएगा, किंतु जल संरक्षण के तौर-तरीकों को प्रयोग में लाने के लिए सरकारी तंत्र की भूमिका बहुत आशा जनक नहीं है। यद्यपि सरकार ने विभिन्न राज्यों में जल संरक्षण संबंधी नियम कानून बना रखे हैं लेकिन व्यवहार में वह नियम कानून कागजों तक ही सीमित है ,क्योंकि सरकारी तंत्र जल संरक्षण के लिए प्रायः वर्षा ऋतु में ही सक्रिय होता है और खाना पूरी कर अपने कर्तव्य की इतिश्री मान लेतां है। उसकी ढिलाई के कारण देश के अनेक बड़े हिस्सों में जनता चाह कर भी इस कार्य में हिस्सेदार नहीं बन पाती ।फलस्वरूप बारिश का अधिकांश जल बहकर समुद्र में चला जाता है ।आज आवश्यकता है कि जल संरक्षण हेतु जन आंदोलन का रूप देने के लिए न केवल सरकार सक्रिय हो बल्कि राज्य सरकारों के साथ उनकी विभिन्न एजेंसियों को भी सक्रिय करें, जिससे न केवल बारिश के जल को तो संरक्षित किया ही जा सके अपितु पानी की बर्बादी को भी रोका जा सके ,क्योंकि एक और जहां जल संकट गंभीर रूप लेता जा रहा है वहीं दूसरी ओर अनेक कार्यों में जल का दुरुपयोग भी किया जा रहा है। गाड़ियों की साफ सफाई ,विभिन्न प्रकार की फैक्ट्रियों में भूगर्भ के जल का अंधाधुंध दोहन, गन्ना तथा धान जैसी फसलों के लिए भूगर्भ के जल का अत्यधिक प्रयोग, स्वच्छता अभियान के अंतर्गत बने शौचालयों की व्यवस्था हेतु जल का प्रयोग अनेक ऐसे कार्य हैं जिनमेंआवश्यकता से अधिक पानी बहाया जा रहा है। साथ ही जल स्रोतों की  भी उचित देखभाल नहीं की जा रही है,उन्हें प्रदूषित होने से नहीं बचाया जा रहा है । पहले शहर में तालाब ,कुंआ व झील आदि अनेक प्रकार के जल स्रोत हुआ करते थे जिनमें वर्षा का जल एकत्रित होता था लेकिन अब शहरों से तालाब और अन्य जल स्रोतों का अस्तित्व ही समाप्त हो चुका है ।फलस्वरूप वर्षा का जल संरक्षित न होकर बह  जाता है। शहरीकरण में जल के निकास हेतु नालियां तो बनायी गयी हैं, किन्तु उनसे जल संरक्षित न होकर बह जाता है, खुले क्षेत्रों में पहले पार्कों में पानी एकत्र होता था तथा रिस रिस कर भूमि के अंदर जाता था किंतु अब पार्क भी सीमेंटेड हो गए हैं फलस्वरूप पार्कों के द्वारा भी बहुत कम पानी ही रिसरिस कर भूमि के अंदर जा पाताहै। वर्षा से जो पानी आ रहा है उसे संरक्षित किए जाने की अत्यंत आवश्यकता है। देश में हो रहे निरंतर शहरों के विकास के कारण यह समस्या निरंतर बढ़ रही है। सरकार को चाहिए कि वह हर भवन में वाटर हार्वेस्टिंग किए जाने को अनिवार्य रूप से प्रभावी बनावे। व्यवहार में देखा जा रहा है कि हमारे शहरों में 10% लोग भी वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम का निर्माण कर वर्षा के जल को संरक्षित करने में अपना योगदान नहीं दे रहे हैं । नए बनने  वाले भवनों में वाटर हार्वेस्टिंग की व्यवस्था किया जाना अनिवार्य बना देना चाहिए, जिससे वर्षा का पर्याप्त जल भूगर्भ में जाकर भूगर्भ के जलस्तर को बढ़ा सके अन्यथा निरंतर असीमित मात्रा में किए जा रहे दोहन से भूगर्भ का जलस्तर निरंतर गिरकर एक दिन समाप्त प्राय हो जाएगा और हमारे समक्ष पानी की समस्या विकराल रूप धारण कर उपस्थित होगी जिसका कोई निदान ढूंढे नहीं मिलेग
आज आवश्यकता है कि प्रत्येक सरकारी विभाग उन्हें दिए गए दायित्व का पूर्णतया निर्वहन करते हुए जल स्रोतों को प्रदूषण से पूर्णरूपेण बचाए किंतु व्यवहार में उनमे इस संदर्भ में सक्रियता नहीं देखी जाती वरन् उनके संरक्षण में अनेक औद्योगिक इकाइयों द्वारा जल संरक्षण के नियम कानून को ठेंगा दिखाते हुए अपने अपशिष्ट जल एवं कचरे से जल स्रोतों को ,अनेक पावन नदियों को निरंतर प्रदूषित किया जा रहा है। यद्यपि सरकार ने राष्ट्रीय नदी संरक्षण योजना के अंतर्गत 16 राज्यों की 34 नदियों को प्रदूषण मुक्त करने तथा उनके जल को पीने योग्य बनाने के लिए5800  करोड रुपए की धनराशि अपने बजट में आवंटित की है, जिसका एकमात्र उद्देश्य गंगा नदी के साथ अन्य नदियों को भी पूर्णरूपेण प्रदूषण मुक्त करना है किंतु सरकारी गति से यह नहीं लगता कि यह कार्य सरकारी देखरेख में समय अंतर्गत संपन्न हो सकेग । केंद्र  सरकार ने तो इस संबंध में अपने हिस्से के₹2500 करोड़ विभिन्न राज्यों को निर्गत भी कर दिए हैं किंतु राज्य सरकारों की सरकारी गति से यह नहीं लगता कि नदियों की साफ सफाई का कार्य गति पकड़ सकेगा, क्योंकि किसी भी राज्य सरकार द्वारा अभी तक इस दिशा में कोई ठोस प्रयास नहीं किया जा रहा है। साथ ही नदियों को संरक्षित ,साफ करने के विभिन्न अभियानों का भी अभी तक का अनुभव कोई बहुत अच्छा नहीं रहा है। इस संदर्भ में राज्यों की उदासीनता का मुख्य कारण यह रहा है कि उनके द्वारा जिन भी सरकारी विभागों को नदियों की साफ सफाई का दायित्व सौंपा जाता रहा है उन विभागों को इस कार्य का कोई अनुभव नहीं रहा है और ना ही उन विभागों को नदियों के प्रदूषण मुक्त बनाए जाने हेतु पूर्णरूपेण उत्तरदायित्व ही सौंपा गया, सरकारी विभाग इस कार्य में पूर्ण मनोयोग से न लगकर उसकी खानापूर्ति तक की सीमित रहते हैं।सरकारी विभागों के साथ ही साथ उक्त कार्य हेतु सामान्य जनमानस को भी जोड़े जाने की आवश्यकता है क्योंकि जब तक आम नागरिक नदियों जल स्रोतों को प्रदूषण मुक्त किए जाने की दिशा में जागरूक नहीं होगा ,इस कार्य को पूर्णता प्रदान करने की संभावना नहीं बनती। निसंदेह प्राचीन काल में हमारी संस्कृति में आम जनमानस की सहभागिता नदियों को प्रदूषण मुक्त बनाए रखने हेतु बनी हुई थी ।हमारी संस्कृति में नदियों को माता के रूप में स्वीकार कर उन्हें जीवित मानते हुए उनमें किसी प्रकार के अपशिष्ट को न छोड़ कर उन्हें सदा ही  शुद्ध एवं पवित्र बनाए रखने की दिशा में जागरूक रहकर कार्य किया जाता था। फलस्वरूप हमारी नदियां अभी कुछ वर्ष पूर्व तक पूर्णरूपेण शुद्ध जल से ओतप्रोत थी। फलस्वरूप नदियों के जल के साथ ही साथ अन्य समस्त जल स्रोतों का प्रयोग पीने के पानी के रूप में भी किया जाता था किंतु अब स्थिति पूर्णरूपेण बदल चुकी है। बीते कुछ दशकों में नदियों तथा अन्य जल स्रोतों की अत्यधिक दुर्दशा हुई है तथा समस्त जल स्रोत अत्यधिक प्रदूषित हुए हैं, उनके इस प्रदूषण के लिए औद्योगीकरण और शहरीकरण के साथ सरकारी तंत्र की सुस्ती भी उत्तरदायी  है। ग्रामीण और शहरी इलाकों में जिस सरकारी तंत्र का यह दायित्व था कि नदियां अतिक्रमण और प्रदूषण से मुक्त रहें, उसने अपने दायित्वों का निर्वहनन भली-भांति नहीं किया। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के साथ साथ राज्यों के ऐसे बोर्ड भी अपने दायित्वों का निर्वहन ईमानदारी के साथ न कर मात्र औपचारिकता निर्वाह तक ही सीमित रहे फलस्वरूप उनके द्वारा जल स्रोतों के बढ़ रहे प्रदूषण को अनदेखा करने के कारण वह निरंतर अत्यधिक प्रदूषित होते रहे। फलस्वरूप आज उन का जल पीने के योग्य तो है ही नहीं, स्नान करने में भी अनेकानेक रोग हो जाने का खतरा होने के कारण कोई भी व्यक्ति उसका प्रयोग नहीं करना चाह रहा ।यहां तक कि किसान ऐसे जल स्रोतों  से अपने जानवरों की रक्षा हेतु उन्हें दूर रखने का प्रयास करता है। इस दिशा में सरकारी तंत्र द्वारा किया गया कार्य अभी तक किसी प्रकार की आशा एवं उम्मीद प्रदान नहीं करता क्योंकि जल स्रोतों के प्रदूषण की रोकथाम के लिए बनाई गई विभिन्न सरकारी एजेंसियां अपने हिस्से का कोई कार्य ईमानदारी से नहीं कर रही है ।फलस्वरूप नदियों के किनारे बसे शहरों में स्थापित सीवेज शोधन संयंत्र आधी अधूरी क्षमता से ही काम कर रहे हैं। गंगा नदी को प्रदूषण मुक्त किए जाने का कार्य भी अत्यंत मंथर गति से चल रहा है उसे 2020 तक प्रदूषण मुक्त किए जाने की बात कही गई थी जो अब पढ़ कर 2022 तक में संपन्न किए जाने की बात की जा रही है।कार्य की गति को देखते हुए यह नहीं लगता कि 2022 तक यह कार्य संपन्न हो जाएगा और हमारी गंगा मां पूर्णरूपेण शुद्ध एवं पवित्र होकर पूर्व की भांति पुनः प्राप्त होगी। आज आवश्यकता है सरकारी कार्यों में उत्तरदायित्व निर्धारण की, जिसके द्वारा समय से कार्य संपन्न करने का दायित्व सौंप कर संबंधित एजेंसियों से समय से ही कार्य संपन्न कराया जाए ,तभी जल स्त्रोत एवं नदियां प्रदूषण मुक्त हो सकते हैं अन्यथा सरकारी धन की बंदरबांट में लगे हुए विभिन्न प्रकार की एजेंसियां एवं तत्व निरंतर कार्य को लंबा घसीटते हुए उसके इस बजट को भी निरंतर  बढ़ाने की मांग कर सरकार पर आर्थिक बोझ बढ़ाने के साथ ही साथ अपने उत्तरदायित्व विहीन  कार्य से देश की विकास की गति को भी बाधित करते रहेंगे।

पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेई ने देश में विद्यमान पानी की समस्या को दृष्टि में रखकर नदियों को आपस में जोड़ कर समय-समय पर उनके जल में हो रही वृद्धि तथा कमी के चलते आवश्यकतानुसार अपेक्षित नदी में जल प्रवाह को बढ़ाकर जल समस्या के निदान की कल्पना की थी, जिसके लिए उन्होंने नदी जोड़ो अभियान की शुरुआत की थी। उक्त योजना वर्तमान सरकार की भी प्राथमिकता में है किंतु व्यवहार में उसका अवतरण नहीं देखा जा रहा है। सरकार ने उक्त योजना हेतु अपने बजट में मात्र ₹100000 का प्रावधान किया है।। समझ में नहीं आता उक्त धनराशि से योजना का कौन सा कार्य संपादित होगा उक्त धनराशि तो संबंधित कर्मचारियों के जलपान एवं पत्राचार हेतु भी पर्याप्त नहीं दिख रही है। नदी जोड़ो अभियान के अंतर्गत मध्य प्रदेश की बेतवा और केन नदी को जोड़ने की योजना सर्वप्रथम हाथ में ली गई थी किंतु अनेक वर्ष बीत जाने के बाद भी यह योजना अभी तक मूर्त रूप नहीं ले सकी है। नदियों को परस्पर जोड़ने की अन्य योजनाएं सरकार की कृपा दृष्टि की बाट जोह रही हैं किंतु बजट में आवंटित सरकारी धन को देखते हुए नहीं लगता इस दिशा में कोई प्रयास होगा और पूर्व प्रधानमंत्री अटल जी की कल्पित योजना मूर्तरूप लेकर देश की जल समस्या को दूर करने में अपना अप्रतिम योगदान दे सकेगी।
जल की कमी के कारण अनेक राज्यों में नदियों के जल के बंटवारे को लेकर भी निरंतर विवाद होते रहते हैं ।यह विवाद विशेष रूप से जल की समस्या से ग्रस्त दक्षिण भारत के राज्यों में देखने को मिल रहे हैं, जिस के निदान हेतु सरकार द्वारा अंतरराज्यीय नदी जल विवाद संशोधन विधेयक 2019 को मंजूरी दी गई है, जिससे राज्यों के मध्य होने वाले नदी जल विवादों को दूर करने में आसानी होगी तथा आवश्यकतानुसार संबंधित राज्यों को नदियों का जल प्राप्त होगा। साथ पेयजल की समस्या को दूर करने के लिए खारे जल को पीने योग्य बनाने के लिए भी सरकार द्वारा कार्य किया जा रहा है ।नीति आयोग इस दिशा में निरंतर क्रियाशील है। खारे जल को पीने योग्य बना लिए जाने पर दक्षिण भारत एवं समुद्र तटीय प्रदेशों में पीने के पानी की समस्या का निदान प्राप्त किया जा सकेगा जिसके अभाव में प्रदूषण की दिनोंदिन गंभीर होती समस्या से पूरे भारत को प्रदूषित भोजन और पानी के प्रयोग से भारी कीमत चुकानी पड़ रही है।फाउंडेशन फॉर मिलेनियम सस्टेनेबल डेवलपमेंट गोल्स और रिसर्च फर्म थाट आर्बिट्रेस के ताजा अध्ययन में यह बताया गया है कि जीवन के लिए जरूरी पानी और भोजन के दूषित होने से देश को 2016 -17 में 734427 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ जो देश के कुल जीडीपी का 4.8 फीसदी था और अगर स्थिति पर नियंत्रण नहीं पाया गया तो सन 2022 तक नुकसान रुपए 950000 करोड़ तक पहुंच सकता है। स्पष्ट है कि प्रदूषित जल राष्ट्र की प्रगति के समक्ष सुरसा के मुंह की तरह बढ़ता जा रहा है जिस पर त्वरित नियंत्रण राष्ट्रहित में अत्यंत आवश्यक है।
जहां एक और हमारे जल स्रोत प्रदूषण से दूषित हो कर उपयोग के लिए उपयुक्त नहीं रह गए वहीं दूसरी ओर लगभग 4500 छोटी बड़ी नदियां सूख कर गायब हो गई हैं सरकारी रिपोर्ट के अनुसार ही बिहार में 250 झारखंड में 141असम में 28 मध्यप्रदेश में 21गुजरात में 17 बंगाल में 17 कर्नाटक में 15 केरल और उत्तर प्रदेश में 13-13 मणिपुर और उड़ीसा में 12-12 मेघालय में 10 और जम्मू कश्मीर में 9 नदियां लगातार सूखती जा रही हैं, किंतु इन नदियों के संरक्षण के लिए कोई कार्यवाही नहीं की जा रही है। आज नदियों के संरक्षण की कोई व्यवस्था नहीं है और न ही सरकार द्वारा इस संदर्भ में कोई भी अपनी नीति निर्धारित की गई है जिसके अभाव में बहुत सी नदियों में जल की मात्रा या तो निरंतर कम होती जा रही है या उनका पानी सूखता जा रहा है और वह अपने अस्तित्व के संकट से जूझ रही हैं। एक शोध के अनुसार बिहार की 90% नदियों में पानी नहीं बचा है तथा लगभग 250 नदियां गायब हो चुकी हैं झारखंड में भी 141 नदियां गायब हो चुकी हैं ।इसका कारण इन नदियों में बढ़ता हुआ प्रदूषण है। जिस को नियंत्रित करने का केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड या सरकार के पास कोई रीति नीति नहीं है। आज सबसे अधिक आवश्यक आवश्यकता नदियों को प्रदूषण मुक्त करने तथा उनके अविरल प्रवाह को बनाए रखने के लिए लुप्त हो रही छोटी छोटी नदियों को भी जीवन देने की  आवश्यकता है जिस की ओर से केंद्र एवं राज्य की सरकारों ने पूरी तौर पर अपनी आंखें बंद कर रखी हैं।
छोटी छोटी नदियों के सूख जाने तथा अन्य नदियों एवं जल स्रोतों के प्रदूषित हो जाने से जल की उपलब्धता की समस्या निरंतर बढ़ती जा रही है जिससे राष्ट्र के विकास के समक्ष प्रश्नचिन्ह खड़ा हो रहा है। 2016 में विश्व बैंक के एक अध्ययन में कहा गया है कि यदि भारत जल संसाधनों का कुशलतम उपयोग नहीं करता तो 2050 तक उसकी जीडीपी विकास दर 6 फ़ीसदी से से भी नीचे रह सकती है। नीति आयोग ने भी अभी बताया है की औद्योगिक केंद्रों वाले शहर अगले साल तक शून्य भूजल स्तर तक जा सकते हैं। तमिलनाडु और महाराष्ट्र जैसे उद्योगों से भरे पूरे राज्य अपनी शहरी आबादी के 53 से लेकर 72 फ़ीसदी हिस्से को ही जलापूर्ति करने में सक्षम हैं, जिसे देखते हुए उपलब्ध जल को नियोजित रूप से इस्तेमाल करने की योजना बनाना भी आवश्यक है ।भूगर्भ के जल का  औद्योगिककरण और फसलों की सिंचाई के नाम पर भूगर्भ से असीमित मात्रा में जल निकाले जाने कीअनुमति नहीं होनी चाहिए ,बल्कि सिंचाई की अधिक मांग करने वाली फसलों को
निश्चित क्षेत्रफल में ही उनकी खेती तथा उन्हें निश्चित मात्रा में ही पानी के उपयोग की अनुमति मिलनी चाहिए। आज हमारे देश में खेती की सिंचाई डूब प्रणाली के अंतर्गत की जाती हैजिसमें खेत को लबालब पानी से भर दिया जाताहै, फलस्वरूप अत्यधिक मात्रा में पानी को भूगर्भ से निकाला जाता है जबकि उससे काफी कम मात्रा में फसल की सिंचाई की जा सकती है। डूब प्रणाली के स्थान पर प्रत्येक पौधे की जड़ तक पानी पहुंचाने के लिए इजरायल की 'ड्रिप और स्प्रिंकलर' प्रणाली को व्यापक स्तर पर विकसित कर उपयोग में लाने की आवश्यकता है। साथ ही फसल तैयार होने में कम पानी की आवश्यकता वाली फसलों और उनकी उन  प्रजातियों की खेती किए जाने की आवश्यकता हैजो सबसे कम पानी में भी अधिक फसल प्रदान करती हैं।आज 1 किलोग्राम चावल पैदा करने में 4500 लीटर  तथा 1 किलोग्राम गेहूं के उत्पादन में 2000 लीटर पानी खर्च होता है ,जिस पर नियंत्रण कर कम से कम पानी उपयोग कर 'पर ड्रॉप मोर क्राप ' को चरितार्थ कर अधिक फसल पैदा की जा सकती है। कृषि उत्पादन पर पानी के असीमित प्रयोग पर अंकुश लगाने के साथ ही साथ औद्योगिक उत्पादन पर भी जल के उपयोग में अंकुश लगाने की आवश्यकता है। औद्योगिक इकाइयां अपने उत्पाद के उत्पादन में भूगर्भ के जल का असीमित दोहन करती हैं। शीतल पेय  जैसे उत्पाद बनाने वाली कंपनियां हजारों लीटर पानी व्यर्थ में बहा देती हैं जिस का राजस्व भी किसी भी प्रकार से सरकार को प्राप्त नहीं होता। केंद्र एवं राज्य सरकारों को चाहिए कि वह औद्योगिक इकाइयों के भूगर्भ के जल के उपयोग की सीमा निर्धारित कर दे, जिससे निर्धारित सीमा से अधिक जल का उपयोग किसी  इकाई द्वारा किया नजा सके। साथ ही भूगर्भ के जल के उपयोग हेतु बोरिंग किए जाने हेतु उसकी गहराई की सीमा भी निर्धारित कर दी जानी चाहिए ,क्योंकि व्यवहार में देखा जा रहा है कि भूगर्भ स्थित जल को वर्षा का जल न मिलने के कारण भूगर्भ जलस्तर निरंतर गिरता जा रहा है।भूगर्भ के जल का उपयोग करने वाली औद्योगिक इकाइयां तथा किसान अपनी बोरिंग की गहराई निरंतर बढ़ाकर अत्यधिक पानी का दोहन करते हुए उसे अतिशीघ्र समाप्त करने की दिशा में कार्य कर रहे हैं ,जिनमें अंकुश लगाना जल की उपलब्धता बनाए रखने के लिए अत्यंत आवश्यक है। जलवायु एवं पारिस्थितिकी मे परिवर्तन होने के कारण वर्षा की अनियमितता तथा उसमें हो रही निरंतर कमी के चलते भूगर्भ का जलस्तर निरंतर नीचे की ओर जा रहा है,जिस में वृद्धि करना आज की आवश्यकता है जो वर्षा के जल के संरक्षण से ही संभव है। अन्यथा  स्थिति में देश में जल केेेे अभाव केे कारण गंभीर स्थिति का सामना करना पड़ेगा जिसका तत्काल निदान खोज पाना अत्यंत कठिन होगा।