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नर्मदा घाटी में बढ़ता भूकंप का खतरा
September 14, 2019 • Snigdha Verma
 
 
नर्मदा घाटी मे बडे-बडे जलाशय नर्मदा-सोन लिनामेंट के, यानी भूकंप-प्रवण पट्टी, में ही बने हैं और वहां से

जो फॉल्ट ज़ोन्स, यानी खतरे के पथ, निकले हुए हैं यहाँ भी भूकंप के धक्के आज ही नहीं कई सालों से
धरती के भूचाल ने देना शुरू किया है। बड़े जलाशयों का दबाव-प्रभाव जो पड़ता है, उससे पत्थर के ज़मीन
के नीचे के पत्थर और प्लेट्स पर असर होता है और खतरा खड़ा होता है। इसके लिए सरदार सरोवर का
स्थान भी चुनते हुए सात जगहों मे परीक्षा करने के बाद ही एक स्थान, जो आज है (बडगाम उत्तर किनारे
पर और मुखडी दक्षिण किनारे पर) वह चुनकर इन दो गुजरात के गाँव के बीच सरदार सरोवर को खड़ा
किया गया। लेकिन सरदार सरोवर के नीचे 18 मीटर तक गढ्ढा करते हुए उस पूरे गढ्ढे को लाखों टन लोहा
और लाखों टन सिमेंट भरके बांध को पुख्ता बनाने का दावा सरकार करती रही है, लेकिन प्रत्यक्ष में
केवल बांध नहीं बल्कि बांध के इर्द-गिर्द की तमाम इमारतें बर्बाद होती है और लोगों का मानवीय और
संसाधनिक नुकसान होता है। यह अनुभव है बरगी के बांध का, जहाँ जबलपूर के भूकंप का केंद्र रहा।
सरदार सरोवर के केंद्र से निकला भूकंप कच्छ मे 2001 मे आया तो अभी-अभी सौराष्ट्र और सूरत मे भी
पिछले साल मई और अगस्त महीने मे जो भूकंप आए, उसका भी सरदार सरोवर में ही केंद्र था।
इस पूरे घटना-क्रम को रिकॉर्ड करने के लिए जो सिजमोग्राफिक सेंटर लगाए गये उनमें 9 मध्य प्रदेश मे
होते हुए पिछले कुछ सालों मे मोदी-शासन ने इन सेंटर से निकले रिकॉर्ड को मशीन के द्वारा गांधीनगर
की ओर मोड़ लेकर वही की एक संस्था को इसके विश्लेषण का कार्य दिया। आज मध्य प्रदेश शासन के
पास, हमारे अनुसार, न डेटा है, न जानकारी, ना ही निष्पक्ष लोगों से किया विश्लेषण। इस स्थिति मे इस

साल सरदार सरोवर में जो लबालब पानी भरना शुरू कर दिया है, वह सरदार सरोवर के गेट बंद रखते हुए,
उसके साथ-साथ अन्य बाँधो मे,अन्य जलाशयों मे भी अधिक वर्षा के कारण पानी भर जाता है, तो जैसे
लातूर मे हुआ था वैसे ही तमाम जलाशयों का एकत्रित दबाव, एकत्रित भरने के साथ होता ही है, और उस
दबाव के गिरते, भूकंप आता है, खतरा बढता है। खतरे के अनुसार 3 रिक्टर स्केल के आगे के भूकंप बहुत
गंभीर रुप से देखना ज़रुरी होता है। लेकिन यहाँ किसी ने भी ध्यान नहीं देते हुए आज यह स्थिति बन गयी
है कि सरदार सरोवर के डूब-क्षेत्र के लगत राजपूर तहसील के भमोरी और उमरिया, जिलवा रोड, साकड़,
मदिल जैसे जो गाँव है, उन गाँव-गाँव मे आज न केवल बड़े-बड़े धमाके, विस्फोट जैसी आवाज़ आती है,
लेकिन साथ साथ कई खाट उडती है, तो रात को बच्चों के साथ, बहनों, भाईंयो को बाहर आकर गाँव की
चौक मे सोना पड़ता है। कहीं दीवारों मे दरारें आ पहुँची हैं और लोगों को डर है कि यहाँ कच्छ के जैसा
आतंक न मच जाए। पिछले कुछ दिनों से बड़वानी जिले के अलावा धार जिले के मनावर तहसील के
एकलबारा गाँव मे भी डूब आ चुकी है और डूब के साथ-साथ भूकंप भी शुरू हुआ है। एकलबारा मे दो दिन
पहले के रोज़ और कल सुबह तक जो धमाके हुए हैं उसके साथ साथ, जैसा हमारे जगदीश भाई बताते हैं,
कि पहली मंज़िल पर बैठे हुए भी उनको पूरी बिल्डिंग हिलने का आभास निर्माण हुआ। उनका कहना था कि आवाज़ के साथ-साथ हिले और कुछ मकान भी! कोई पहली मंज़िल पर बैठे थे तो उनको नीचे उतर आना पड़ा, जब पूरा गाँव एकलबारा के अंदरूनी रास्ते पर मंदिरों के सामने एकत्रित हुआ था। आज यह
खतरा और बढता दिखाई दे रहा है जबकि अभी-अभी सिजमोमीटर्स बिठाए गये है, वह भी केवल राजपूर
तहसील मे। बाकी सिजमोग्राफिक सेंटर मृतवत होते हुए भी जबलपूर के ऑब्जर्वेटरी के लोग आकर
देखकर चले गये। अब दिल्ली के एक्स्पर्ट माने गए कोई भू-वैज्ञानिक जोशी जी आए हैं, अब उनके बयान भी दो प्रकार के हैं - एक है कि अभी हमे समय लगेगा निष्कर्ष पर आने के लिए और दूसरा बयान है कि 20-25 दिनो तक यह मामला जारी रहेगा, आगे नहीं, ऐसा दिखाई दे रहा है। हम चाहते हैं कि तत्काल मध्यप्रदेश सरकार इन घटनाक्रम का दखल ले और अगर दखल नहीं लेती है, तो महाराष्ट्र के रत्नागिरी ज़िले मे
जैसा कि बांध फूटा या उत्तराखंड मे जैसे हादसा हुआ (उसके पहले हमारे साथी विमल भाई और अन्य की
दी हुई चेतावनी को दुर्लक्षित किया) उसी प्रकार से यहाँ पर भी होना संभव है।
हमारा इसीलिए मानना है कि मध्य प्रदेश सरकार ने अपने स्तर पर अपने राज्य के विश्पक्ष विशेषज्ञों के
द्वारा पूरी जानकारी (सीस्मोग्राफ्स की) गांधीनगर से या यहीं के केंद्रों से लेकर उसका विश्लेषण करा
लेना चाहिए और वह भी तत्काल।लोग भयभीत हैं, जिन्हें मात्र भूकंप आने पर छुपने और अन्य सूचनाएं
दी जा रही हैं।गाँव उमरिया के आधे लोगों ने गाँव खाली कर दिया है।सेगावां (बड़वानी) और संवारा (धार)
में भी भूकंप के रात-बरात धक्के आ रहे हैं।इस प्रकार की घटनाएँ होंगी तो मध्य प्रदेश शासन की बदनामी
होगी। इतना ही नहीं तो उनपर एक आरोप पत्र दाखिल करने की ज़िम्मेदारी जनता को पार करनी पड़ेगी।
लेकिन आज के आज अगर वह पत्र लिख कर नर्मदा नियंत्रण प्राधिकरण के साथ-साथ केंद्र के जल-
शक्ति मंत्रालय हो या और संबंधित विभाग हो इन सब को खबर करते और यह कहते कि इतना पानी
एक साथ एक सीजन में भरना भी वैज्ञानिक दृष्टि से ग़लत है तो कुछ बात होती! मध्य प्रदेश सरकार
निष्क्रिय दिखाई देती है और आज तो यह जब खतरा सामने दिखाई दे रहा है तब तो पानी भरने से
तत्काल रोकना केंद्र सरकार की ज़िम्मेदारी होगी! मध्य प्रदेश शासन को भी इसपर ही सरदार सरोवर के
गेट खुले रखने की मांग करना ज़रूरी है। बड़वानी हो, अंजड़ हो या कुक्षी मनावर, बड़ी जनसँख्या के इस
प्रकार के शहरों के लिए जब यह खतरा अभी सामने दिखाई देता है, तब उन सभी शहर-वासियों ने भी
आज ही जागृत होकर इस पर अपनी आवाज़ बाहर आकर उठानी चाहिए नहीं तो बहुत देर हो चुकी होगी
और कोई कुछ नहीं कर पाएंगे, यही नर्मदा बचाओ आंदोलन की चेतावनी है।