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अटल भूजल योजना
February 23, 2020 • डॉ .दिनेश प्रसाद मिश्र • Environment


देश में व्याप्त जल संकट के समाधान हेतु
पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेई के जन्मदिन पर भारत सरकार ने  उनके नाम पर अटल भूजल योजना का श्रीगणेश किया।जिन क्षेत्रों में भूजल का स्तर अत्यंत  नीचे जा चुका है और पीने के पानी सहित सिंचाई के लिए किसानों को पर्याप्त पानी मयस्सर नहीं है, ऐसे क्षेत्रों पर विशेष ध्यान देकर पानी उपलब्ध कराने का केंद्र सरकार का सुचिंतित सुव्यवस्थित प्रयास है --  अटल भूजल योजना। इस योजना के जरिए भूजल का संरक्षण और संवर्धन करते हुए उसका व्यवस्थित प्रबंधन कर हर घर तक पीने का स्वच्छ पानी पहुंचाने के साथ ही साथ हर खेत को पानी उपलब्ध कराने की योजना पर काम किया जाएगा। जल शक्ति मंत्रालय के अंतर्गत संचालित यह योजना भूगर्भ से जल के अति दोहन को रोककर जमीन में पानी के स्तर को बढ़ाने के लिए काम करेगी ।इस योजना को मूर्त रूप देने के लिए विश्व बैंक के सहयोग से केंद्र सरकार ने 6000 करोड़ रुपए की व्यवस्था की है, जिसमें से 3000 करोड़  विश्व बैंक के माध्यम से ऋण प्राप्त होंगे तथा 3000 करोड़ रुपए की व्यवस्था केंद्र सरकार करेगी। इस प्रकार विश्व बैंक द्वारा उपलब्ध करायी गयी धन राशि बैंक ऋण के रूप में होगी ,जिसका भुगतान केंद्र सरकार करेगी। शेष 50% नियमित बजटीय सहायता से केंद्रीय सहायता के रूप में उपलब्ध कराया जाएगा। राज्यों को विश्व बैंक का संपूर्ण ऋणऔर केंद्रीय सहायता अनुदान के रूप में उपलब्ध कराई जाएगी। प्रधानमंत्री द्वारा योजना को प्रभावी करने की घोषणा के पूर्व ही 12 दिसंबर को विश्व बैंक ने योजना को स्वीकृति प्रदान करते हुए अपनी सहभागिता में योजना को मूर्त रूप देने को स्वीकार कर लिया है। अटल जल योजना को 5 वर्षों 2020-- 21 से 2024 --25 की अवधि में क्रियान्वित कर संबंधित क्षेत्र में जल समस्या का समाधान कर भूगर्भ के जल स्तर को ऊपर लाते हुए घर-घर तक नल से जल पहुंचाने की घोषणा को मूर्त रूप देने तथा किसानों को फसल की सिंचाई हेतु पर्याप्त जल उपलब्ध कराना योजना की प्राथमिकता है।योजना के माध्यम से देश के सात प्रमुख राज्यों,  जिनका भूगर्भ का जलस्तर अत्यंत नीचे जा चुका है तथा पीने के पानी सहित सिंचाई हेतु जल की आवश्यकता निरंतर मुंह बाए खड़ी रहती है तथा समय-समय पर पानी की व्यवस्था हेतु भी सरकार को  आगे आना पड़ता है, मे प्रथम चरण में योजना का कार्य प्रारंभ किया जाना प्रस्तावित है। इन राज्यों का चयन भूजल की कभी प्रदूषण और पर्यावरण के अन्य विभिन्न मानकों को ध्यान में रखते हुए किया गया है ।ऐसे  7 राज्यों महाराष्ट्र ,कर्नाटक ,मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश ,हरियाणा, राजस्थान और गुजरात के भूजल स्तर को ऊपरउठाने में अटल भूजल योजना के माध्यम से कार्य कर जल शक्ति मंत्रालय जल स्तर में सुधार लाने का कार्य करेगा। इस योजना के कार्यान्वयन से इन राज्यों के 78 जिलों ,193ब्लाकों में लगभग 8350 ग्राम पंचायतों को लाभ मिलने की उम्मीद है।  अटल जल योजना के अंतर्गत प्रथम चरण में 7 राज्यों में स्थाई भूजल प्रबंधन के लिए संस्थागत प्रबंधकों को मजबूत किया जाएगा, साथ ही संस्थाओं की क्षमता वृद्धि की जाएगी ।इसके अलावा डाटा विस्तार पर फोकस किया जाएगा जो जल सुरक्षा संबंधी योजनाओं को तैयार करने में मददगार साबित होगा । साथ ही भूजल प्रबंधन की उपलब्धियां हासिल करने वाले राज्यों को प्रोत्साहन भी दिया जाएगा ।योजना में कृषि में इस्तेमाल होने वाले पानी के उचित प्रबंधन को भी शामिल किया गया है ,इससे सूक्ष्म सिंचाई, फसल विविधता ,अलग विद्युत फीडर जैसे कदम उठाए जाएंगे ताकि उपलब्ध जल संसाधनों का उचित प्रयोग किया जा सके तथा किसानों को उसका सही लाभ मिल सके।इस योजना का उद्देश्य है कि भूजल की मात्रा को फिर से बढ़ाया जाए, जिससे किसानों को खेती के लिए पर्याप्त मात्रा में जल उपलब्ध कराया जा सके, जिससे  फसल उत्पादन में वृद्धि होने के साथ-साथ उनकी आय में भी वृद्धि हो और सरकार द्वारा निर्धारित लक्ष्य किसान की आय दोगुनी स्तर पर पहुंच सकें । यह योजना केंद्र सरकार की अत्यंत महत्वाकांक्षी योजना है,इस योजना को केंद्रीय जल संसाधन मंत्रालय की तरफ से सुविचारित एवं सुव्यवस्थित रूप से संचालित किया जा रहा है ।सरकार जागरूकता अभियान चलाकर वहां के किसानों तथा जनसामान्य को अपने साथ जोड़ कर भूगर्भ के जल स्तर को बढ़ाने का कार्य करेगी। केंद्र सरकार राज्यों को धनराशि देगी जिससे राज्य प्रशासन  उत्तरदायी संस्थानों का सहयोग लेकर भूजल प्रबंधन में सुधार लाने के काम में सामुदायिक सहभागिता को बढ़ावा देते हुए आम जनमानस को भी योजना से जुड़ कर पानी की समस्या से समाधान पाने का प्रयास करेगा। इस प्रकार जल के संरक्षण और कुशल उपयोग के लिए समाज के व्यवहार में बदलाव लाया जाएगा तथा यह प्रयास किया जाएगा कि समाज का हर व्यक्ति उस क्षेत्र विशेष के जल संरक्षण और जल संवर्धन में  भूगर्भ जल स्तर को विस्तार देने में अपना सहयोग प्रदान करें। सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट का कहना है कि यह योजना इसलिए सार्थक साबित हो सकती है क्योंकि इसमें विभिन्न जल प्रबंधन  समुदायों तथा ग्राम पंचायतों से  सहयोग लेने पर विशैष ध्यान दिया गया है। भूगर्भ के जल का विश्व में सर्वाधिक दोहन भारत में ही  किया जाता है। यहां प्रतिवर्ष 230 क्यूबिक किलोमीटर भूजल का उपयोग कर लिया जाता है, जोकि भूजल के वैश्विक उपयोग का लगभग 25%है ।वैज्ञानिकों का अनुमान है उत्तर भारत में गेहूं और चावल के उत्पादन से लगभग 54 सौ करोड़ क्यूबिक मीटर जल प्रतिवर्ष भूगर्भ से निकाल लेने के कारण वह निरंतर घट रहा है।नीति आयोग द्वारा जारी एक रिपोर्ट में लगातार घटते भूजल के स्तर पर चिंता जताई गई है ।उसके अनुसार वर्ष 2030 तक देश में भूजल में आ रही गिरावट सबसे बड़े संकट के रूप में उपस्थित होगी तथा 2020 तक ही दिल्ली बेंगलुरु चेन्नई और हैदराबाद सहित 21शहरों में भूजल लगभग समाप्त होने  के कगार पर पहुंच जाएगा।

अटल भूजल योजना के अंतर्गत प्रस्तावित कार्यों की सार्थकता को देखते हुए उसका महत्व अपने आप बढ़ जाता है फलस्वरूप हर राज्य उससे जुड़ कर अपने यहां व्याप्त जल की समस्या से निदान पाना चाहता है। आज योजना के प्रथम चरण में मात्र 7 राज्यों को उसके कार्यक्षेत्र के रूप में चुना गया है।योजना के प्रथम चरण में योजना के सफल होने पर उस को विस्तार देते हुए निकट भविष्य में उसे पूरे देश में प्रभावी बनाया जा सकता है किंतु पंजाब के मुख्यमंत्री ने अटल जल योजना के महत्त्व को देखते हुए प्रधानमंत्री से अनुरोध किया है कि वह पंजाब राज्य को भी इस योजना के प्रथम चरण में शामिल करने के लिए जल मंत्रालय को निर्देश दें क्योंकि पंजाब में सर्वाधिक भूजल की कमी  हैं , उसके 22 जिलों में से पठानकोट एवं मुक्तसर छोड़कर शेष 20 जिले में पानी का भूजलस्तर अत्यधिक नीचे चला गया हैकिंतु पंजाब को इस योजना में शामिल नहीं किया गया है।  पंजाब को निरंतर गिर रहे भूगर्भ जल स्तर से पानी की कमी का सामना करना पड़ रहा है। केंद्रीय भूजल बोर्ड की एक रिपोर्ट के अनुसार राज्य के तीन चौथाई से ज्यादा ब्लॉक जल संकट से जूझ रहे पंजाब के प्राकृतिक संसाधनों जैसे भोजन में कभी धान की खेती का के कारण है और देश के लिए खाद्य सुरक्षा हासिल करने के लिए धान की खेती का अपना योगदान है किंतु उसके उत्पादन में जल के अत्यधिक प्रयोग के कारण पृथ्वी की सतह पर उपलब्ध पानी भी  पिछले कुछ दशकों में अत्यंत कब हुआ है इसलिए पंजाब जल संरक्षण हेतु सहायता का मजबूत दावेदार है। संभव है निकट भविष्य में पंजाब के अनुकरण मेंअन्य राज्य भी योजना में अपने आप को शामिल करने की बात करें जिसे देखते हुए योजना को विस्तार देने के संदर्भ में सोचना पड़ेगा किंतु योजना को विस्तारित करने के पूर्व उसके लिए पर्याप्त संसाधनों की व्यवस्था सुनिश्चित करना सर्वोच्च प्राथमिकता होगी अन्यथा योजना मूर्त रूप नहीं ले पाएगी।
‌ वैज्ञानिकों का मानना है कि 2050 तक भूगर्भ जल स्रोत 75%  समाप्त हो जाएंगे क्योंकि  प्रतिवर्ष भूगर्भ में वर्षा का जितना जल सुरक्षित होता है उससे कई गुना विभिन्न माध्यमों से निकाल लिया जाता है। पृथ्वी के जल संवर्धन की एक सीमा है किंतु उसके दोहन की कोई सीमा नहीं है, अनवरत जल दोहन के कारण पृथ्वी का जल निरंतर समाप्त हो रहा है। इस योजना के अंतर्गत कार्य करते हुए वर्षा के जल की एक एक बूंद को सुरक्षित करते हुए भूगर्भ के जल स्तर में वृद्धि कर पानी की समस्या से तो निजात ही पाया जाएगा,साथ ही पानी के इस्तेमाल को लेकर भी लोगों को जागरूक किया जाएगा जिससे कि पानी की बर्बादी को रोका जा सके और जल का संरक्षण किया जा सके। एक रिपोर्ट के अनुसार भारत मे प्रतिदिन करीब 48. 42 अरब लीटर लीटर पानी स्नान आदि करने में बर्बाद कर दिया जाता है ।नीति आयोग ने।अपनी एक रिपोर्ट में कहा है कि लगातार घट रहा भूजल स्तर वर्ष 2030 तक देश में सबसे बड़े संकट के रूप में उपस्थित होगा! केंद्रीय भूजल बोर्ड तथा राज्य भूजल विभागों के आंकड़ों के अनुसार देश में कुल मूल्यांकित 6584 इकाइयों में से 1034 इकाइयों को अत्यधिक दोहन की गई इकाइयों की श्रेणी में रखा गया है । सामान्यत:इसे डार्क जोन अर्थात् पानी रहित क्षेत्र कहा जाता है। जल शक्ति मंत्रालय से समाज की तरफ से जल संरक्षण के लिए व्यापक प्रयास किए जा रहे हैं जिससे एक तरफ जल जीवन मिशन प्रत्येक घर में पाइप द्वारा जल पहुंचाने का कार्य करेगा और दूसरी ओर अटल जल योजना ऐसे क्षेत्रों पर विशेष कार्य करेगी जहां पर भूगर्भ जल स्तर बहुत कम है । अटल जल योजना जल प्रबंधन में ग्राम पंचायतों  को सहभागी बनाकर  बेहतर प्रदर्शन करने के लिए उन्हें प्रोत्साहित करने के साथ ही साथ बेहतर प्रदर्शन करने वाली ग्राम पंचायतों को  और व्यवस्थित कार्य करने हेतु अधिक धन आवंटन किया जाएगा। आज 70 वर्षों में 18 करोड़ ग्रामीण परिवारों में से केवल तीन करोड़ के पास पाइपलाइन के द्वारा जलापूर्ति की जा रही है।इस योजना के अंतर्गत पाइप लाइन के माध्यम सेअगले 5 वर्षों में 15 करोड़ घरों में पीने के पानी की सुविधा प्रदान करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। इस योजना के अंतर्गत हर घर को नल के माध्यम से पीने का पानी उपलब्ध कराया जाएगा क्योंकि मीठे पानी के स्रोत के रूप में भूगर्भ का जल ही सर्वाधिक प्रयोग में लाया जाता है जिसे घर-घर तक पहुंचाने का दायित्व सरकार स्वीकार कर सबको पीने का स्वच्छ जल उपलब्ध कराएगी।
भूजल और संबंधित क्षेत्रों के काम करने वाले 92 देशों के लगभग  1100 वैज्ञानिकों, विशेषज्ञों और अन्य संबंधित लोगों ने सभी सरकारों और गैर सरकारी संस्थाओं से अनुरोध किया कि वह वैश्विक स्तर पर भूजल उपलब्धता बनाए रखने के लिए तत्काल कदम उठाए। पृथ्वी का 99% प्रतिशत ताजा पानी, जिसे पिया जा सकता है, वह भृजल के रूप में है ।इस कारण यह पीने के पानी ,खाद्य सुरक्षा, जलवायु परिवर्तन की दिशा में बेहतर करने जैव विविधता को बनाए रखने, धरती के ऊपर विद्यमान ताजा जल स्रोतों को बनाए रखने और संयुक्त राष्ट्र सतत विकास लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए अति महत्वपूर्ण है। दुर्भाग्यवश कई क्षेत्रों में भूजल का स्तर या तो नीचे गिर गया है या फिर प्रदूषित हो गया है और इससे सामाजिक आर्थिक विकास को नुकसान पहुंच रहा है और खाद्य आपूर्ति प्रभावित हो रही है और हमारी पारिस्थितिकी को नुकसान पहुंच रहा है। आईआईटी खड़कपुर के एसोसिएट प्रोफेसर अभिजीत बनर्जी का कहना है कि इतिहास में हम इस समय भारत में सबसे ज्यादा भूजल का इस्तेमाल कर रहे हैं। इसके साथ ही हम अपने जीवन के आधार तुलनात्मक रूप से एक अनवीकरणीय संसाधन को तेजी से समाप्त कर रहे हैं ।मुखर्जी और लोगों ने रेखांकित किया है कि भूजल से जुड़ी चुनौतियों और अवसरों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीयनीतियों में जगह नहीं मिलती है किंतु अब जल जीवन मिशन और अटल जल योजना के माध्यम से भूजल से जुड़ी समस्त चुनौतियों को स्वीकार कर उनका समाधान खोजने का प्रयास किया जाएगा।

‌ यह सौभाग्य है कि जल की उपलब्धता की दृष्टि से भारत एक जल समृद्ध देश है ,जिसमें कल-कल करती नदियां जल की अपार राशि को अपने अंक में समाए हुए उसे सहज रूप में उपलब्ध कराती हैं, किंतु नदियों के संरक्षण संवर्धन एवं उनके अविरल प्रवाह को बनाए रखने हेतु सरकार की कोई नीति -योजना न होने के कारण  नदियां, वैज्ञानिक प्रगति ,अधा -धुंध शहरीकरण एवं तथाकथित राष्ट्रीय विकास के नाम पर किये जा रहे  कार्यों से प्रभावित होकर निरंतर प्रदूषित ,जलहीन एवं अस्तित्व हीन होती जा रही हैं। देश की बड़ी- बड़ी नदियां तो किसी न किसी रूप में आज अभी अपना अस्तित्व बचाए हुए हैं, किंतु उनको जल की आपूर्ति करने वाली 45 00 से अधिक छोटी-छोटी नदियां सूख कर विलुप्त हो गई हैं। साथ ही जल के उचित प्रबंधन और उससे संबंधित सही योजनाओं के न होने के कारण देश की बड़ी आबादी को आवश्यकता के अनुसार जल उपलब्ध नहीं हो पा रहा है। जल की अनुपलब्धता किसी मौसम विशेष में न होकर वर्ष पर्यंत बनी रहती है ,यह अलग बात है कि गर्मी के दिनों में जल की कमी अधिक होती है तथा वर्षा के आते ही उसमें कुछ राहत मिल जाती है ।  आज जल प्रबंधन राष्ट्र एवं सरकार के समक्ष एक बड़ी समस्या है ,जिसके सुनियोजित उपक्रम से देश में उपलब्ध जल की अगाध राशि का उपयोग सुचारू रूप से कर जल संकट से निदान पाया जा सकता है।द वर्ल्ड रिसर्च इंस्टीट्यूट की रिपोर्ट के अनुसार भारत सहित 17 अन्य देशों में पानी की समस्या अत्यंत गंभीर है। यह समस्त देश गंभीर जल संकट का सामना कर रहे हैं ,अगर इस समस्या पर शीघ्र ध्यान नहीं दिया जाता तो इन देशों में पानी की एक बूंद भी नहीं बचेगी। डब्ल्यू आर आई ने  भूजल भंडार और उसमें आ रही निरंतर कमी ,बाढ़ और सूखे के खतरे के आधार पर विश्व के 189देशो को वहां पर उपलब्ध पानी को दृष्टि में रखकर  श्रेणी बद्ध किया है। जल संकट के मामले में भारत विश्व में 13वें स्थान पर है ।भारत के लिए इस मोर्चे पर चुनौती बड़ी है, क्योंकि उसकी आबादी जल संकट का सामना कर रहे अन्य समस्याग्रस्त 16 देशों से 3 गुना ज्यादा है। रिपोर्ट के अनुसार भारत के उत्तरी भाग में जल संकट भूजल स्तर के अत्यंत नीचे चले जाने के कारण अत्यंत गंभीर है। यहां पर जल संकट  'डे जीरो' के कगार पर है,इस स्थिति में नलों का पानी भी सूख जाता है। विगत दिनों बंगलौर एवं चेन्नई में यह स्थिति उत्पन्न हो गयी थी।कम हो रही वर्षा तथा निरन्तर गिरते भूगर्भ जल स्तर को देखते हुये निकट भविष्य में सम्पूर्ण भारत, विशेष रूप से उत्तर भारत में पानी की अत्यन्त कमी अतिशीघ्र होने वाली है, जिसे भांपकर ही प्रधानमंत्री मोदी ने द्वितीय बार शपथ ग्रहण करने के पश्चात अपनी पहली 'मन की बात 'में जल समस्या से निजात पाने के लिए जल संरक्षण हेतु जनान्दोलन चलाने की बात कही है। आज देश के अनेक भागों में जल की अनुपलब्धता के कारण आंदोलन और संघर्ष हो रहे हैं।दक्षिण भारत के चेन्नई से लेकर उत्तर भारत के अनेक शहरों में पेयजल की समस्या मुंह बाए खड़ी है। देश के लगभग 70% घरों में शुद्ध पेयजल उपलब्ध नहीं है ।लोग प्रदूषित पानी पीने के लिए बाध्य हैं,जिसके चलते लगभग 4 करोड़ लोग प्रतिवर्ष प्रदूषित पानी पीने से बीमार होते हैं तथा लगभग 6 करोड लोग फ्लोराइड युक्त पानी पीने के लिए विवश हैं। उन्हें पीने के लिए शुद्ध जल उपलब्ध नहीं है। देश में प्रतिवर्ष लगभग 4000 अरब घन मीटर पानी वर्षा के जल के रूप में प्राप्त होता है किंतु उसका लगभग 8% पानी ही हम संरक्षित कर पाते हैं, शेष पानी नदियों ,नालों के माध्यम से बहकर समुद्र में चला जाता है।  हमारी सांस्कृतिक परंपरा में वर्षा के जल को संरक्षित करने पर विशेष ध्यान दिया गया था, जिसके चलते स्थान स्थान पर पोखर ,तालाब, बावड़ी, कुआं आदि निर्मित कराए जाते थे , जिनमें वर्षा का जल एकत्र होता था तथा वह वर्ष भर जीव-जंतुओं सहित मनुष्यों के लिए भी उपलब्ध होता था,  किंतु वैज्ञानिक प्रगति के नाम पर इन्हें संरक्षण न दिए जाने के कारण अब तक लगभग 4500 नदियां तथा 20000 तालाब झील आदि सूख गई हैं तथा वह भू माफिया के अवैध कब्जे का शिकार होकर अपना अस्तित्व गवा बैठे हैं। देश की बड़ी-बड़ी नदियों को जल की आपूर्ति करने वाली उनकी सहायक नदियां वैज्ञानिक प्रगति के नाम पर अपना अस्तित्व गवा बैठी हैं,जो कुछ थोड़े बहुत जल स्रोत आज उपलब्ध हैं,उनमें से अनेक औद्योगिक क्रांति की भेंट चढ़ चुके हैं ।फलस्वरूप उनके पानी में औद्योगिक फैक्ट्रियों से निकलने वाले गंदे पानी कचड़े के मिल जाने से उन का जल इतना प्रदूषित हो गया है कि उसको  पीना तो बहुत दूर स्नान करने पर भी अनेक रोगों से ग्रस्त हो जाने का खतरा विद्यमान है। देश की सबसे पावन नदी गंगा कुंभ के अवसर पर भले ही स्नान योग्य जल से युक्त रही हो ,किंतु आज वह फैक्ट्रियों के कचड़े एवं उनके छोड़े गए प्रदूषित पानी के प्रभाव से गंदे पानी की धारा बन गई है , जिस में स्नान करने से पूर्व श्रद्धालु से श्रद्धालु व्यक्ति को भी अनेक बार सोचना पड़ जाता है। भारत की कृषि पूर्णतया वर्षा जल पर निर्भर है। वर्षा पर्याप्त होने पर सिंचाई के अन्य साधन सुलभ हो जाते हैं किंतु वर्षा न होने पर सभी साधन जवाब दे देते हैं और कृषि सूखे का शिकार हो जाती है। चीनी उत्पादक महाराष्ट्र एवं उत्तर प्रदेश के किसान निरंतर गन्ने की खेती पर बल दे रहे हैं और सरकार भी गन्ना उत्पादन के लिए उन्हें प्रोत्साहित कर रही है ।इसी प्रकार धान की खेती के लिए पंजाब छत्तीसगढ़ उत्तर प्रदेश इत्यादि अनेक राज्य धान की फसल का क्षेत्रफल निरंतर बढ़ाते जा रहे हैं किंतु उसके लिए पानी प्राप्त न होने के कारण वह पानी भूगर्भ से निकाल कर खेतों को सींचा जा रहा है जिससे भूगर्भ में स्थित जल का स्तर निरंतर गिरता जा रहा है, जिस ओर कोई ध्यान नहीं दे रहा और पानी की समस्या निरंतर बढ़ती जा रही है।, स्पष्ट है कि जल प्रदूषण के अनेक स्रोत हैं जो सामूहिक रूप से जल को प्रदूषित करते हैं। इनमें प्रमुख हैं शहरीकरण के परिणाम घरेलू सीवेज, अनियंत्रित तथा हरित क्रांति के परिणामस्वरूप पानी पर अवलंबित खेती एवं औद्योगिक अपशिष्ट तथा कृषि कार्यों में अत्यधिक प्रयोग में लाए गए कीटनाशक ,जल में घुल मिलकर भूगर्भ के जल को  अत्यधिक मात्रा में प्रदूषित कर रहे है ,जिससे निजात पाने के संदर्भ में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने चुनाव प्रचार के दौरान यह घोषणा की थी कि पुनः सत्ता में आने पर खेती को पानी तथा हर घर को सन 2024 तक नल  के माध्यम से पीने का पानी उपलब्ध कराया जायेगा, जिस को दृष्टि में रखते हुए हर खेत को पानी के साथ हर घर को भी नल के माध्यम से पेयजल उपलब्ध कराने तथा सूख रही नदियों को पुनर्जीवित करने, नदियों में विद्यमान प्रदूषण को समाप्त करने तथा स्वच्छ जल स्रोतों को पुनर्जीवित करने ,के उद्देश्य से जल शक्ति मंत्रालय कार्य कर रहा है।

जल शक्ति मंत्रालय द्वारा जन सहयोग के साथ सरकारी व्यवस्था के अंतर्गत जल संरक्षण योजना को मूर्त रूप देने का कार्य अटल जल  योजना के माध्यम से युद्ध स्तर पर किए जाने का कार्य किया जा रहा है किंतु इस कार्य को यथार्थ स्वरूप प्रदान करने के लिए अटल योजना को जल आंदोलन के रूप में कार्य करने की आवश्यकता है जिसके लिए हर व्यक्ति को आगे आना होगा क्योंकि अपने देश में साल भर में वर्षा से जो जल प्राप्त होता है उसका केवल 8% ही सुरक्षित हो पाता है। आज जब पानी की कमी से प्रभावित होने वाले क्षेत्रों की संख्या बढ़ती जा रही है तभी आवश्यकता है कि पानी बचाने और उसे सुरक्षित करने के लिए हर संभव कार्य किए जाएं।देशवासियों के  सहयोग और संकल्प से मौजूदा संकट का समाधान किया जाएगा क्योंकि जल संरक्षण के कार्य को मूर्त रूप देने में सरकारी तंत्र की भूमिका काफी निराशाजनक रही है । यद्यपि विभिन्न राज्यों ने जल संरक्षण के संदर्भ अपने अनेकानेक नियम कानून बनाए हैं किंतु व्यवहार में उनके द्वारा उनका उपयोग कर जल संरक्षण संबंधी कोई कार्य यथार्थ में मूर्त रूप ले लेते हुए नहीं देखा जाता ।वह कागजों तक ही सीमित है ।वस्तुतः सरकारी व्यवस्था आमतौर पर वर्षा ऋतु के समय ही सक्रिय होती हैं और दिखावटी खाना पूरी करके अपने कर्तव्य को इतिश्री प्रदान कर देती हैं ।सरकारी तंत्र के ढिलाई के कारण देश के एक बड़े हिस्से में आम जनता चाहकर भी जल संरक्षण के काम में हिस्सेदार नहीं बन पाती ।परिणाम स्वरुप बारिश का जल व्यर्थ में बह जाता है  ।आज आवश्यकता है कि सरकार अटल जल योजना को जन आंदोलन का रूप देने के लिए न केवलआवश्यक कार्य करें अपितु जल संरक्षण के क्षेत्र में कार्य करने वाली विभिन्न एजेंसियों संस्थाओं को भी सहभागी बनाये।राज्य सरकारों के साथ-साथ  यह सक्रियता सबमें सतत नजर आनी चाहिए, जिससे न केवल बारिश के जल का संरक्षण हो सके अपितु पानी की एक-एक बूंद का सदुपयोग हो सके। पा की बर्बादी को रोकते हूए यह सुनिश्चित किया जाए कि जल को संरक्षित करने, उसके दुरुपयोग को रोकने और उसे प्रदूषित होने से बचाने की जो भी योजनाएं बनाई जाए उनके क्रियान्वयन
‌का दायित्व जिसे भी सौंपा जाए उसे योजना की सफलता की गारंटी के लिए पूर्णरूपेण उत्तरदायी बना दिया जाए जिससे कि वह अपना सर्वश्रेष्ठ सामर्थ्य योजना को प्रदान करने के लिए कटिबद्ध रहे। देश में जल की आवश्यकता की पूर्ति भूजल से ही संभव हो पाती है भूजल देश के सिंचित क्षेत्र और ग्रामीण पेयजल आपूर्ति में महत्वपूर्ण योगदान देता है वर्तमान समय में बढ़ती जनसंख्या शहरीकरण और औद्योगीकरण के कारण देश के सीमित भू संसाधनों पर अत्यधिक दबाव है अतः इस योजना के माध्यम से अनियंत्रित भूजल दोहन को नियंत्रित करना आधारभूत संरचना को बढ़ावा देना भू जल की गुणवत्ता में वृद्धि करना पर्यावरणीय प्रभाव को कम करना खाद्य सुरक्षा को सुनिश्चित करना तथा भू-जल संसाधनों की दीर्घकालीन निरंतरता को सुनिश्चित करने की दिशा में एक सार्थक कदम साबित हो सकता है जिससे न केवल देश की जल समस्या का समाधान होगा अपितु राष्ट्र जल समस्या से निजात पाकर विकास की दिशा में निरंतर अग्रसर होगा नित्य नए आयाम प्राप्त करेगा हंस ।




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