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भारत जोड़ो- संविधान बचाओ, समाजवादी विचार यात्रा
January 23, 2020 • Snigdha Verma

 

 

समाजवादी समागम की ओर से महात्मा गांधी - कस्तूरबा की 150 वीं जयंती और भारतीय समाजवादी आन्दोलन के 85 बरस पूरे होने के अवसर पर एक भारत यात्रा आयोजित की जा रही है।इसका शुभारम्भ बापू की शहादत की तिथि 30 जनवरी को गाँधी स्मृति, 30 जनवरी रोड़, दिल्ली से होने जा रहा है। समाजवादी समागम को इस यात्रा में अनेकों जन-संगठनों का प्रशंसनीय सहयोग मिला है। समाजवादी समागम गांधी-लोहिया-जयप्रकाश परंपरा से जुड़े स्त्री-पुरुषों का सक्रिय समाजवादियों की निकटता को बढ़ावा देने वाला मंच है और इसकी पहल पर 2014 और 2019 के बीच अब तक मुंबई, पटना, लखनऊ, ग्वालियर, दिल्ली, इंदौर और बेंगलुरु में सार्थक संवादों का आयोजन तथा साहित्य प्रकाशन-प्रचार किया गया है। समाजवादी विचारों, संगठनों और कार्यक्रमों से जुड़े देश सेवकों की इस देश-यात्रा का समापन समाजवादी आन्दोलन की स्थापना तिथि 17 मई को पटना में होगा। 

इस लोकजागरण यात्रा का उद्देश्य स्वराज के अधूरेपन को दूर करना है. इसके लिए आर्थिक-राजनीतिक-सामाजिक मोर्चों पर समाजवादी नीतियों और कार्यक्रमों के पक्ष में लोकमत निर्माण करना है. इस यात्रा के जरिये लोकतंत्र-सर्वधर्म समभाव-समता-सम्पन्नता बंधुत्व के पांच सूत्रों में आस्था को मजबूत करना है। इसके आधार पर सभी सहमना व्यक्तियों, संगठनों और आन्दोलनों की एकता और साझी सक्रियता का भी विस्तार किया जायेगा। राष्ट्रीय आन्दोलन की विरासत, समाजवादी अन्दोलन के आदर्शों और भारतीय संविधान के मूल्य इस देशव्यापी यात्रा की प्रेरणा के तीन आधार स्तम्भ हैं। हर देशसेवक का इसमें योगदान के लिए हम स्वागत करते हैं।

यात्रा ऐसे समय में होने जा रही है जब देश की नागरिक एकता खतरे में है। देश की बेमिसाल विविधता को जाति और धर्म के नाम पर नष्ट करने की साजिश हो रही है। हमारे स्वतंत्रता सेनानियों के मार्गदर्शन में बने संविधान में प्रदत्त नागरिकता कानून को तोडा मरोड़ा जा चुका है। वसुधैव कुटुम्बकम के मानवतावादी आधार को नष्ट करके सांप्रदायिक भेदभाव के आधार पर संशोधित किया गया है। इसके बाद अब नागरिकता रजिस्टर और जनसँख्या रजिस्टर की आड़ में नागरिकों के बीच साम्प्रदायिक, क्षेत्रीय, भाषाई और जातिगत दरारों को बढाने का प्रयास है। देश के कई हिस्सों में आस्था और परंपरा की आड़ में उन्मादी भीड़ों के जरिये कमजोर नागरिकों को सताने की हरकतों को बढ़ावा मिल रहा है। चुनाव आयोग समेत सभी लोकतांत्रिक संस्थाओं को ध्वस्त करने का अभियान चलाया जा चुका है। मीडिया और न्यायपालिका पर सत्ता-प्रतिष्ठान की जकड़ बढाई जा रही है। राजनीतिक गुंडों और पुलिस द्वारा विद्यार्थियों और बुद्धिजीवियों को आतंकित किया जा रहा है।

‘सबका साथ-सबका विकास-सबका विश्वास’ के नारे पर चुनी गयी केन्द्रीय सरकार राष्ट्र-निर्माण के मोर्चे पर विफल हो चुकी है। देश में आर्थिक समस्याओं की बाढ़ आ गयी है। ग्रामीण अर्थव्यवस्था में चौतरफा गिरावट जारी है। रेलवे, एयर इण्डिया, बीपीसीएल आदि सार्वजनिक क्षेत्र के उद्योगों को मुनाफे के बावजूद मुट्ठीभर अरबपतियों के हाथों बेचा जा रहा है। कोर्पोरेट घरानों का अधिकतम मुनाफा सुनिश्चित करने के लिए 55 करोड़ श्रमिकों के श्रम कानून से जुड़े अधिकारों को मात्र 4 कोड में सीमित करके ख़तम कर दिया गया है। शिक्षा और स्वास्थ्य को सर्वसुलभ करने की बजाय व्यावसायिक स्वार्थों के हवाले करने की नीति जारी है। पूंजीवाद को बढ़ावा देनेवाली नीतियों के कारण घरेलू उत्पादन और उपभोग दोनों में तेजी से गिरावट के बावजूद कोई चिंता नहीं है। एक तरफ सरकार में ही लाखों नौकरियां खाली पड़ी हैं और दूसरी तरफ स्वीकृत पदों को भी बरसों से खाली रखा गया है। आर्थिक मंदी और वित्तीय अराजकता के कारण महंगाई और बेरोजगारी लगातार बढ़ रही है।

हमारे देश के सार्वजनिक जीवन में व्याप्त भ्रष्टाचार की जड़ हमारी चुनाव व्यवस्था में है। चुनावों को लगातार महंगा करना संसदीय लोकतंत्र को धनशक्ति का गुलाम बना रहा है। संसद व् विधानसभाओं से लेकर पंचायत चुनाव तक बेशुमार अवैध कमाई के बूते प्रभावित हो रहे हैं। ‘चुनाव बांड’ की व्यवस्था ने कालेधन के राजनीतिक इस्तेमाल का रास्ता बना दिया है। चुनाव सुधारों के लिए देश 1974 से इंतजार कर रहा है। लेकिन सत्ताधारी जमात और चुनाव आयोग जानबूझकर आँख मूंदे हुए हैं। इससे चुनाव के बावजूद लोकशक्ति की बजाय धनशक्ति का राज पर कब्जा हो रहा है। इस स्थिति को बदलने के लिए लोकतंत्र और लोकशक्ति में आस्था रखनेवालों का व्यापकतम मोर्चा बनाकर चुनाव सुधार के लिए राष्ट्रव्यापी संघर्ष की ओर देश को तैयार करना भी इस यात्रा का एक मुख्य उद्देश्य है।