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जलवायु परिवर्तन का दुष्प्रभाव इस समय वैश्विक बाज़ारों पर देखने को मिल रहा है - प्रो० डॉ० आसमी रज़ा
June 5, 2020 • S Z Mallick • Environment

Delhi

विश्व मे सबसे अधिक प्रभावित होने वाले देशों की सूची में भारत का नाम सबसे ऊपर है। मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (एमआईटी) के शोधकर्ताओं ने अपने अध्ययन का एक रिपोर्ट प्रकाशित करते हुए यहां तक चेतावनी दी है कि यदि जलवायु परिवर्तन अपनी वर्तमान गति से इसी प्रकार सुचारु रूप से चलता रहा तो सदी के अंत तक घातक गर्मी की लहरें मानव अस्तित्व के साथ साथ दक्षिण एशिया के बड़े हिस्से में भी बढ़ते तापमान और वर्षा के पैटर्न में बदलाव से भारत की जीडीपी में 2.8 प्रतिशत की कमी आ सकती है। विश्व बैंक की रिपोर्ट के अनुसार 2050 तक बढ़ते तापमान और जलवायु परिवर्तन भारत के लिए एक बड़ा खतरा हो सकता हैं। रिपोर्ट के अनुसार, गंगा और सिंधु नदी के तटवर्तिय आबादी वाले कृषक क्षेत्र में लगभग डेढ़ अरब से अधिक लोगों का और देश की लगभग 50 प्रतिशत आबादी के जीवन स्तर को प्रभावित कर सकती है रह्ना दुभर हो सकता है । जिससे वैश्विक स्तरीय बाजार पर बुरा प्रभाव पड़ सकता है। पर्यावरणविदों एवं बाज़ार अनुभवों का मानना है की इस दुष्यप्रभाव को रोकने के लिये अक्षय ऊर्जा में बड़े पैमाने पर यदि निवेश करने जैसी रणनीतियों पर कार्य किया जाय तो समस्या को दूर किया जा सकता है। । 

वैज्ञानिकों और पर्यावरणविदों का मानना है कि भारत की गंगा जैसी अन्य बड़ी नदिओं में बहुसंख्यक भारतीय जनमानस की आस्था है जिसमें जलवायु परिवर्तन के कारण खतरा बढ़ रहा है, । वैज्ञानिकों ने चेतावनी देते हुए कहा है कि बढ़ते तापमान के कारण हिमालय के ग्लेशियर बहुत तेज़ी से पिघल रहे हैं, जिससे कुछ नदियों का जल स्तर बढ़ रहा है।  जिसमें प्रतिवर्ष बहने वाले जल की मात्रा प्रभावित हो रही है। जलवायु परिवर्तन के हानिकारक और गहरा पर्यावरणीय प्रभाव गंभीर जल तरंगों और नदी के जल के लिए खतरे तक सीमित नहीं हैं। बल्कि पिछले वर्षों से दुनिया भर में देखी गई अन्य घटनाओं में शामिल हैं। हिमालय के बर्फ और समुद्री बर्फ की मात्रा में भारी कमी आयी है , समुद्र का जल स्तर बढ़ना, समुद्र की तीव्रता में बदलाव, सूखा, गर्म हवा वाली तूफान के साथ-साथ भारी मूसलाधार वर्षा की घटनाओं की आवृत्ति में वृद्धि। दुनिया में पहले से ही भारत को अधिक आपदाग्रस्त बेहद संवेदनशील प्रभावित देशों में से एक माना जाता है। इसकी तटवर्तिये घनी आबादी समुद्र के बढ़ते स्तर से बहुत प्रभावित हो सकती है, जबकि बदलते मौसम के पैटर्न से कृषि और खाद्य सुरक्षा को नकारात्मक रूप से प्रभावित कर सकते हैं।

वैज्ञानिकों का मानना है की जल की तीव्रता में कमी के कारण घातक बीमारी का प्रकोप बढ़ सकता है।  एक और लगातार भारत के मांग के अनुसार लगातार अन्य विकसित देशों से हरित प्रौद्योगिकी हस्तांतरण होता रहा है। भारत की यह धारणा रही है की अपने को सबसे मुखर समर्थकों में से एक "जलवायु न्याय"  के रूप में देखता रहा है - जो ऐतिहासिक जिम्मेदारियों के साथ-साथ वर्तमान समय की क्षमताएं जलवायु शासन व्यवस्था को आकार देने में बहुत मायने रखती हैं । विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार के पास नीतियां हैं लेकिन उसमे बहुत अधिक जागरूकता पैदा करने की आवश्यकता है। जो नीति निर्माताओं को बहुस्तरीय दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। जलवायु परिवर्तन के लिए स्थानीयकृत लचीलापन को मजबूत करने की आवश्यकता है। विश्लेषण शिक्षा, गैर-कृषि नौकरियों में 30 प्रतिशत सुधार की भविष्यवाणी करता है और पानी के तनाव में कमी भारत की जीडीपी में गिरावट को 2.8 से 1.9 प्रतिशत तक ला सकता है। यह भी चेतावनी दी है कि उपरोक्त कारकों के तेजी से बढ़ने से चीजें जल्दी खराब हो सकती हैं।

जलवायु अर्थशास्त्री प्रो0 निचोलस स्टर्न ने हाल हीके अपने स्टर्न रिव्यू  लैंडमार्क 2006 के शीर्षक'' की रिपोर्ट में कहा कि जलवायु परिवर्तन के खतरे को समझते हुए अर्थशास्त्र    में कहा गया है कि जलवायु परिवर्तन से सबसे बड़ा असर अंतर्राष्ट्रीय बाजार पर भी देखा जा सकता है। स्टर्न ने अर्थशास्त्र पर नवीनतम जलवायु विज्ञान के प्रभाव को देख रहे हैं, उन्होंने कहा कि ''परिणाम जितना उसने सोचा था उससे कहीं अधिक विनाशकारी है'' आज, 2020 में होने वाले अन्य दलों द्वारा (COP 26) 26 वां सत्र के सम्मेलन में जलवायु परिवर्तन पर विचार गोष्ठी में बताया गया की निम्न स्तरीय औद्योगिक को 2 डिग्री सेल्सियस से कम रखने के लक्ष्य है। उनके महत्वाकांक्षाओं को पूरा नहीं किया जाता है, भारत जैसे बहुत से देश संवेदनशील होंगे और सैकड़ों करोड़ लोगों बेघर हो कर अपने रहने योग्य स्थानों की तलाश में पलायन करेंगे।

स्टर्न, जो लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर हैं उनके द्वारा सीओपी 21 पर 196 देशों द्वारा राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (एनडीसी) को 2015 के पेरिस जलवायु सम्मेलन के रूप में भी जाना जाता है, जो ग्लोबल वार्मिंग को 2 डिग्री सेल्सियस से भी नीचे रखने के लक्ष्य के अनुरूप नहीं है,। कॉप 26 के लिए NDCs में देशों की महत्वाकांक्षा बढ़ने की उम्मीद है, जो कि ग्रह के लिए एक महत्वपूर्ण क्षण होगा, ।