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कोरोना  एवं जल समस्या
May 16, 2020 • डा दिनेश प्रसाद मिश्र • Environment

 

विश्वव्यापी व्यथा के रूप में उपस्थित हुई है -कोरोना महामारी , जिससे समस्त मानव जाति अत्यंत आतंकित है। विकसित देशों अमेरिका ,इटली ,स्पेन ,फ्रांस, चीन आदि में उसके तांडव को देखकर कोरोना वायरस के रूप में प्रत्येक व्यक्ति को यमराज के आगमन का अहसास हो रहा है । लगभग 4 माह के संक्रमण के दौर में कोरोना ने विश्व के लगभग  46,00000 लोगों को अपनी चपेट में ले लिया है , जो जीवन मौत से संघर्ष कर रहे हैं  और 30 6376 लोग मौत के आगोश में भी समा गए हैं। चिकित्सा के क्षेत्र में अत्यंत पिछड़े होने के बावजूद भारत उससे सफलतापूर्वक संघर्ष कर रहा है।सीमित आबादी के अनेक विकसित  देशों में जहां लाखों लोग संक्रमित होकर जीवन मौत से संघर्ष कर रहे हैं वही विश्व में आबादी की दृष्टि से द्वितीय सबसे बड़े देश भारत में अब तक मात्र 85000 लोग ही संक्रमित हुए हैं तथा  उससे प्रभावित होकर लगभग 2700 लोगों की ही मृत्यु हुई है किंतु उसके आतंक के कारण27% लोग कोरोना वायरस के संक्रमण को सीधे-सीधे मौत का आमंत्रण ही मान रहे हैं, इसका मुख्य कारण अब तक इसकी दवा उपलब्ध न होना है। किसी प्रकार की दवा उपलब्ध न होने के कारण उससे सुरक्षा हेतु व्यक्ति का आत्म संयम ही एकमात्र उपाय है जिसके द्वारा वह निरंतर अपनी साफ सफाई करते हुए बार-बार समय-समय पर साबुन से हाथों को धोकर उन्हें सेनेटराइज करें तथा दूसरे व्यक्तियों से दूरी बनाए रखते हुए सोशल डिस्टेंसिंग फिजिकल डिस्टेंसिंग का अनुपालन करें। समस्त सरकारों  तथा कोरोनावायरस के विरुद्ध लड़ रहे चिकित्सक कोरोना से बचाव हेतु यह 2 उपाय ही सुझा रहे हैं -सोशल फिजिकल डिस्टेंसिंग एवं बार-बार साबुन से हाथ धोना तथा उन्हें सेनेटराइज करना।। सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करना तो व्यक्ति के स्वयं के मन एवं इच्छा पर निर्भर करता है किंतु साफ सफाई और बार बार हाथ धोने की क्रिया व्यक्ति की इच्छा के साथ ही साथ जल की उपलब्धता पर भी निर्भर करती है। वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन तथा डॉक्टरों का यही कहना है कि जितना हो सके हाथ साफ रखने की कोशिश करें तथा साबुन एवं सेंनेटाइजर से अपने हाथों को साफ करते रहें।यद्यपि पृथ्वी का दो तिहाई भाग जल से आच्छादित है किंतु आज मानव को पीने के लिए पर्याप्त जल उपलब्ध नहीं है। यूं तो पूरे देश में जल की कमी है अनेक शहरों में भूजल का स्तर ग्राउंड जीरो तक पहुंच गया है यंत्र ग्रीष्म ऋतु के आते ही पानी की समस्या विकराल रूप धारण कर सामने आ गई है ऐसी स्थिति में जब लोगों को पीने का पानी ही मयस्सर नहीं है तो वह पर्याप्त पानी के अभाव में पूर्णा वायरस से बचाव के लिएदिन में कम से कम 10 12 बार हाथ धोने के लिए 20 22 लीटर पानी की व्यवस्था चाह कर भी कहां से करेगा। प्रश्न है कि क्या कोरोना वायरस से बचने के लिए साफ सफाई हेतु पर्याप्त पानी उपलब्ध है?
वस्तुतः भारत सहित विश्व का कोई भी देश पानी की समस्या से अछूता नहीं है सबको अपने नागरिकों को पर्याप्त पानी उपलब्ध कराने हेतु आने के सहा प्रयास करना पड़ता भारत ही नहीं विश्व के अनेक देशों का जलस्तर अत्यंत नीचे जा चुका है और अनेक शहरों में जल का पूर्ण अभाव हो गया है ऑस्ट्रेलिया का कैप्टन पूरी तरह जल रहित बन चुका है वही स्थिति लगभग वही स्थिति हमारे बेंगलुरु का है। भारत के प्रमुख शहर दिल्ली गाजियाबाद मेरठ लखनऊ कानपुर गुवाहाटी हैदराबाद बड़ोदरा जयपुर अजमेर बाड़मेर भुनेश्वर फरीदाबाद अमृतसर लुधियाना शिमला और बैंगलोर मैं पानी का स्तर अत्यंत नीचे जा चुका है यहां के निवासियों को पर्याप्त पीने का पानी उपलब्ध नहीं है। पिछले 10 सालों में ग्रामीण क्षेत्रों में भी भूगर्भ का जलस्तर कम से कम 2 मीटर नीचे जा चुका है। फलस्वरूप देश की लगभग 60% आबादी को उसकी आवश्यकता के अनुरूप पर्याप्त पानी उपलब्ध नहीं है। महाराष्ट्र दिल्ली बुंदेलखंड राजस्थान आदि के अनेक शहरों में टैंकरों से पानी उपलब्ध कराया जा रहा है , जहां टैंकरों के आते ही पानी के लिए लोगों की लंबी-लंबी कतारें लग जा रही हैं। राजस्थान के अजमेर में पानी के लिए संघर्ष में अप्रैल में एक व्यक्ति की मृत्यु हो चुकी है बाड़मेर में तो लोगों का कहना है कि उनके पास भी तो पर्याप्त है किंतु पीने का पर्याप्त पानी उपलब्ध नहीं है, यह स्थिति पूरे राजस्थान की ही नहीं अपितु पूरे देश की है । नीति आयोग की रिपोर्ट के अनुसार पंजाब और राजस्थान के बाद दिल्ली के भूगर्भ जल की उपलब्धता लगभग समाप्ति की ओर अग्रसर है ,इन ।राज्यों के भूगर्भ जल की यह स्थिति उसके अत्यधिक दोहन का परिणाम है।ऐसी स्थिति में जब कोरोना के विरुद्ध संघर्ष में मुख्य हथियार के रूप में पानी ही सबसे आगे हैं, उसकी पर्याप्त उपलब्धता न होने तथा आसन्न जल संकट मैं साफ सफाई की व्यवस्था कैसे होगी, का जवाब नहीं मिल रहा है।
पानी की अनुपलब्धता या उसका अत्यंत सीमित मात्रा में प्राप्त होना जल समस्या का एक पक्ष है। कोरोना महामारी को देखते हुए जल समस्या का तत्काल निदान प्राप्त कर पर्याप्त जल तो प्राप्त  नहीं किया जा सकता है, किंतु सोच समझकर पानी का कम से कम प्रयोग कर अब भी काम चलाया जा सकता है। इसके लिए सीधे नल के पानी से हाथ न धोकर उसे मग या लोटे में लेकर कम से कम पानी का उपयोग करते हुए हाथ धोया जा सकता है ‌। नल के निरंतर चलते रहने से पानी का अत्यंत दुरुपयोग होता है तथा आवश्यकता का कई गुना पानी व्यर्थ में बह जाता है ।ऐसी स्थिति में आज जब हम पानी की भयंकर समस्या से गुजर रहे हैं और साफ सफाई के लिए पानी की अत्यंत कमी है तो हमें कम से कम पानी से अपनी साफ सफाई करनी चाहिए न कि नल खोल कर उससे व्यर्थ मेंअसीमित पानी बहाते हुए । आज आवश्यकता है कि पानी की कमी को देखते हुए प्रत्येक व्यक्ति अपनी जल की न्यूनतम आवश्यकता सुनिश्चित करले और न्यूनतम मात्रा से भी कम जल का उपयोग कर अपना कार्य संपादित करने का प्रयास करें। इससे एक और जहां जल की आवश्यकतानुसार उपलब्धता बनी रहेगी वहीं दूसरी ओर आवश्यक कार्यों के लिए जल भी उपलब्ध रहेगा। वर्षा के जल को संरक्षित न कर पाने से
भूगर्भ का जलस्तर निरंतर नीचे जा रहा है ,अनेक वर्ष से उसमें आ रही निरंतर गिरावट को देखते हुए उसमें वृद्धि हेतु प्रतिवर्ष चर्चा तो की जाती रही है किंतु उसे मूर्त रूप देने हेतु कभी कोई सार्थक ही  नहीं की गई,अपितु उसके स्थान पर भूगर्भ के जल का अंधाधुंध अनियंत्रित
दोहन निरंतर उसके स्तर में कमी ही ला रहा है। विकास के नाम पर कंक्रीट के उग रहे जंगल, अनियंत्रित औद्योगिकरण तथा जल की अत्यधिक मात्रा के बलबूते पर तैयार होने वाली धान गेहूं जैसी फसलें भूगर्भ जल के अनियंत्रित  दोहन को प्रोत्साहित करती है। अत्यधिक अर्जन ,उपार्जन को दृष्टि में रखकर आवश्यकता से अधिक पानी का दोहन निरंतर किया जा रहा है। फलस्वरूप देश के नव विकसित औद्योगिक क्षेत्रों में तथा कृषि की दृष्टि से महत्वपूर्ण हरियाणा पंजाब जैसे राज्यों में भूगर्भ से जल निकालने पर कोई सरकारी नियंत्रण न होने के कारण मनमाना तथा आवश्यकता से अधिक भूजल प्रतिवर्ष निकाला जा रहा है और उसे निकालने के समय यह ध्यान भी नहीं दिया जाता कि वह पानी आवश्यकता के अनुरूप ही निकाला जाए वरन उसकी मात्रा आवश्यकता से कहीं अधिक निकाली जाती है और वह व्यर्थ में बर्बाद हो जाता है। भूगर्भ से जल निकालने के लिए तो हर व्यक्ति तैयार बैठा है किंतु भूगर्भ का जल स्तर को ऊपर उठाने के लिए व्यक्तिगत या सामूहिक रूप से कुछ गिने चुने लोगों को छोड़ दिया जाए तो कोई सार्थक प्रयास नहीं हो रहा है। उद्योगों के लिए जल निकासी की मात्रा को नियंत्रित करने तथा फसलों की सिंचाई हेतु नियंत्रित मात्रा में जल के उपयोग का विधान सरकारों द्वारा किया जाना चाहिए किंतु ग्रीष्म ऋतु आने पर जल की भयंकर समस्या उत्पन्न हो जाने पर सरकारों की माथापच्ची से तो यह लगता है इस दिशा में ठोस प्रयास किए जाएंगे किंतु वर्षा ऋतु आते ही समस्त प्रयास धरे रह जाते हैं और वर्षा ऋतु में पानी की समस्या के स्थान पर बाढ़ की समस्या से निजात पाने की दिशा में कार्य करने का प्लान बनाया जाने लगता है किंतु ना तो गर्मी में आई पानी की समस्या का समाधान प्राप्त हो पाता है और ना ही वर्षा ऋतु में आई बाढ़ की समस्या का। प्रकृति के अनमोल उपहार वर्षा का जल संरक्षित एवं सुरक्षित करने की कोई व्यवस्था ना होने के कारण अनियंत्रित होकर भूगर्भ में न जाकर बहते हुए नदी नालों के माध्यम से समुद्र में चला जाता है और उसका कोई उपयोग नहीं हो पाता , जबकि जल की भयंकर समस्या को देखते हुए यह आवश्यक हो जाता है कि भूगर्भ के जलस्तर को ऊपर उठाने में सहयोगी एकमात्र सहयोगी वर्षा जल को पूर्णरूपेण सुरक्षित करते हुए उसे भूगर्भ में पहुंचाया जाए किंतु इस दिशा में भी कोई सार्थक प्रयास नहीं किए जा रहे। नित्य प्रति उग रहे कंक्रीट के जंगल तथा गगनचुंबी इमारतों में पानी के उपयोग के लिए भूगर्भ के जल का असीमित दोहन तो किया जाता है किंतु प्रकृति के अनमोल उपहार वर्षा जल को संरक्षित करने का कोई ठोस कार्य नहीं किया जाता, जबकि चाहिए कि किसी भी भवन के निर्माण के पूर्व उसका नक्शा स्वीकृत करने वाली एजेंसी भूमि के क्षेत्रफल के अनुपात में वर्षा के जल को भूगर्भ में पहुंचाने की व्यवस्था नक्शा पास करने के साथ ही सुनिश्चित कर लें और यदि उस व्यवस्था के अनुरूप भवन निर्माण में वर्षा के जल को संरक्षित एवं सुरक्षित करने का कार्य नहीं किया जाता तो संबंधित भवनस्वामी एवं उस क्षेत्र विशेष के संबंधित अधिकारी को उत्तरदाई मानते हुए उनके विरुद्ध कठोरतम कार्यवाही सुनिश्चित की जाए । भारतीय सामाजिक व्यवस्था में विधि का शासन आम आदमी के लिए होकर रह गया है। सक्षम एवं प्रभावशाली वर्ग विधि व्यवस्था को अपने अनुरूप ढाल कर उस से बच निकलने का मार्ग निकाल लेते हैं जिसे समाप्त करने हेतु उसके विरुद्ध अनिवार्य दंडात्मक व्यवस्था सुनिश्चित की जानी चाहिए ।भारतीय समाज में दंडात्मक व्यवस्था की छाया में ही कोई बसव्यवस्था स्थापित की जा सकती है ‌, अन्यथा स्थिति में समाज का मनमाना आचरण भूगर्भ के जल का निरंतर दोहन तो करता रहेगा किंतु उसके संरक्षण और संवर्धन की दिशा में कोई कार्य नहीं करेगा। कोरोना वायरस का आगमन अनायास नहीं है। आज  समस्त विश्व आवागमन एवं संचार के संसाधनों में अभिवृद्धि होने के कारण एक गांव के रूप में बदल चुका है। विकसित देशों के हित सब पर भारी पड़ रहे हैं। अपना प्रभुत्व बनाए रखने के लिए संघारक अस्त्रों के साथ ही साथ जैविक विषाणुओं का निर्माण कर उन्हें संघारक अस्त्रों के रूप में प्रयोग करने की भावना भी अनेक देशों में उत्पन्न हो गई है। कोरनावायरस को भी चीन का सृजन माना जा रहा है। यह विषाणु मानवता के विरुद्ध प्रथम याअंतिम नहीं है, इसके पूर्व भी सार्स ,मार्स आदि विषाणु सामने आ चुके हैं जिनमें बड़ी मुश्किल से नियंत्रण पाया जा सका था। अब आया कोरोना , जिस पर अभी तक नियंत्रण नहीं पाया जा सका हैतथा वह किसी केवश में नहीं आ सका है पूरे विश्व में हाहाकार मचाए हुए हैं, जब तक उसमें नियंत्रण प्राप्त करने हेतु दवाओं का आविष्कार नहीं हो जाता तब तक सोशल डिस्टेंसिंग एवं स्वयं की स्वच्छता अर्थात साबुन से बार-बार हाथ धोना तथा उन्हें सेनटराइज करना ही एक मात्र उपाय है, जिसके लिए पर्याप्त मात्रा में पानी उपलब्ध नहीं हो पा रहा है, सरकारों के निरंतर प्रयास से अपार धन जन की हानि होने के बाद कोरोला पर तो नियंत्रण पा लिया जाएगा किंतु पानी की समस्या का निदान तब भी नहीं होगा और आगे आने वाले दिनों में फिर इसी प्रकार के किसी अन्य वायरस या महामारी के आने पर पानी के लिए हाय तौबा मच जाएगा, उससे बचने के लिए आवश्यक है आज ही पानी की समस्या पर गंभीरता पूर्वक विचार करते हुए उसका स्थाई समाधान खोजा जाए और वर्षा जल को पूर्णरूपेण संरक्षित एवं सुरक्षित किया जाए तथा वर्षा का एक जी बूंद वह कर व्यर्थ न होने पाए। प्रकृति द्वारा प्रदत्त वर्षा की एक एक बूंद अनमोल है उसका संरक्षण कर भूगर्भ के जलस्तर में वृद्धि करते हुए जल समस्या का निदान प्राप्त किया जा सकता है ,अन्यथा स्थिति में समस्या अत्यंत गंभीर होगी तथा एक एक बूंद के लिए संग्राम होगा जिसके जिसके लिए समाज ही स्वयं  उत्तरदायी होगा।