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क्यों आया शहरों में सैलाब ?
October 1, 2020 • डॉ दिनेश प्रसाद मिश्र  • Social

 मानव सभ्यता और संस्कृति का विकास सदानीरा नदियों के तट पर ही हुआ है। जीवन में जल का महत्व सर्वाधिक होने के कारण विश्व की समस्त सभ्यताएं नदियों के समीप ही पुष्पित और पल्लवित हुई हैं , साथ ही संसार के समस्त प्राचीन शहर नदियों के किनारे ही बसे हैं किंतु समय-समय पर होने वाली वर्षा से कभी भी यह शहर आक्रांत और संत्रस्त नहीं हुए, वरन् वर्षा का जल इन शहरों के लिए जीवन जल अमृत बनकर निरंतर प्राप्त होता रहा है और यह जल भूगर्भ में जाकर वहां के जल स्तर को बढ़ाते हुए जीव जगत की आवश्यकता अनुसार निरंतर प्राप्त होता रहा है किंतु इसके विपरीत जलवायु परिवर्तन के कारण हुई असामयिक और अनियमित तथा असीमित वर्षा और उसके परिणाम स्वरूप आई भयंकर बाढ़ ने पूरे परिदृश्य को ही बदल कर रख दिया है। विश्व का कोई कोना ऐसा नहीं बचा जहां के शहरों में बाढ़ का दृश्य सुनामी बनकर न उपस्थित हुआ हो। चीन जापान इंग्लैंड अमेरिका ऑस्ट्रेलिया पाकिस्तान स्कॉटलैंड भारत नेपाल आदि के अनेकानेक शहर अकस्मात जल प्लावन के आगोश में आ गए। जल की अधिकता से पूरे के पूरे शहर तैरते हुए से दिखाई पड़ने लगे। जहां एक ओर बड़े-बड़े भवन धराशाई हो गए वहीं दूसरी ओर सड़कों पर अगाध पानी भर गया और वहां पर ठहरी चलती कारें और बड़ी-बड़ी गाड़ियां पानी में बहती पैरवी तैरती नजर आई,ं जनजीवन अस्त व्यस्त हो गया । जल की यह अपार राशि शहर में नदियों से नहीं आई अर्थात शहरों का यह दृश्य नदियों में आई बाढ़ का परिणाम न होकर शहरों में एकत्रित वर्षा जल के भूगर्भ में न समा पाने और उसके प्रवाह पथ में आई बाधाओं के कारण उसकी अप्रतिहत गति के बाधित हो जाने का परिणाम रहा। आखिर ऐसी कौन सी स्थितियां बनी जिससे सदियों से निरंतर प्रवाहमान जल अपने मार्ग पर आगे न बढ़ कर शहरों में सैलाब के रूप में उपस्थित हुआ और शहरों में कहर बनकर बरपा । प्रश्न एक ही है कि शहरों में वहां की व्यवस्था को अस्तव्यस्त कर जनजीवन के समक्ष प्रश्नचिन्ह बनकर शहरों में सैलाब क्यों आया?

 शहरों में सैलाब का आना कोई अकस्मात घटित घटना नहीं है अपितु मनुष्य एवं प्रकृति के बीच निरंतर चल रहे संघर्ष का परिणाम है ।जब तक मानव और प्रकृति में सहअस्तित्व के संस्कार एवं भावना विद्यमान थी तब तक वह दोनों एक दूसरे के पूरक बनकर कार्य करते रहें । प्रकृति जीवन और संसार का पोषण निरंतर करती रही किंतु विकासोन्मुखी व्यवस्था को दृष्टि में रखकर निरंतर प्रयासरत मानव प्रकृति के अस्तित्व को अस्वीकार कर निरंतर उसके साथ छेड़छाड़ करते हुए मन माना आचरण करने लगा जिससे प्रकृति का कुपित हो जाना और उसके भयंकर परिणाम प्राप्त होने में देर नहीं लगी। जलवायु परिवर्तन के कारण मानसून के आने और जाने का समय भी परिवर्तित हो जाने से उसका आकलन कर पाना असंभव सा हो गया है । विगत कई वर्षों से वर्षा की स्थिति भी अनियमित तथा अनिश्चित सी हो गई है, किसी क्षेत्र में अचानक अत्यधिक बारिश हो जाने से शहरों में भी बाढ़ की स्थिति बन जा रही है, जिससे जनधन की अपार हानि होती है। मुंबई दिल्ली बेंगलुरु तिरुअनंतपुरम भुवनेश्वर जयपुर देहरादून कानपुर जोधपुर जैसे शहर नियमित रूप से जलभराव एवं बाढ़ के शिकार बन रहे हैं, जहां बाढ़ आ जाने से शहरी जीवन अस्त व्यस्त हो जाता है और जनथन की अपार क्षति होती है।

आज विकास की अवधारणा के कारण शहरों में बढ़ रहे आबादी के दबाव से कंक्रीट के जंगलों के अत्यधिक विस्तार पा जाने तथा कभी शहर के एक किनारे बहने वाली समीपवर्ती नदी आबादी के दबाव से शहर के अनियंत्रित विकास से बन रहे नए नए मकानों के कारण शहर के बीच में आ गई है जिससे उसका जल प्रवाह क्षेत्र अत्यंत संकुचित होने के साथ-साथ भवन निर्माण सामग्री की असीमित मात्रा को समय-समय पर अपने आगोश में ले लेने के कारण जल प्रवाह के बाधित हो जाने से, अपार जल राशि से युक्त नदियों की धारा अपना मार्ग बनाकर शहर में ही प्रवेश कर जाती है। साथ ही कंक्रीट के जंगलों के कारण भूगर्भ में जाने के मार्ग के अवरुद्ध हो जाने तथा प्रवाह पथ के बाधित हो जाने एवंअसीमित, अत्यधिक वर्षा के होने से वर्षा जल के अपरिमित भंडार के एक साथ इकट्ठा हो जाने और उसके निकल न पाने के कारण शहरों में विनाशकारी सैलाब आता है।

सभ्यता एवं शहरीकरण के प्राथमिक दौर में मानव बस्तियों के निर्माण के समय यद्यपि नदियों का सहारा अवश्य लिया गया था तथा मानव बस्तियां नदियों के किनारे ही स्थापित हुई थी जो कालांतर में जाकर बड़े-बड़े शहरों का रूप ले चुकी हैं ,किंतु इसके बावजूद मानव बस्तियों का निर्माण नदियों के समीप उन्हें पर्याप्त स्थान देते हुए ही किया गया था । प्रायः बस्तियों का निर्माण नदियों के एक किनारे ही किया जाता था । नदियों का दूसरा छोर उनके प्रवाह एवं फैलाव के लिए छोड़ दिया जाता था, जिससे नदियों के बहने के लिए पर्याप्त स्थान मिल जाता था तथा उनकी धारा बिना किसी बाधा के अपने तटवर्ती एवं समीपवर्ती स्थानों में वर्षा जल के रूप में अकस्मात प्राप्त जल की अगाध राशि को अन्य नदी नालों के माध्यम से प्राप्त कर अपनी धारा में समाहित कर उसे गंतव्य तक पहुंचाती थी किंतु आज शहरीकरण की दौड़ में शहरों का अनियंत्रित विकास हुआ। गांव से शहरों की ओर आ रही आबादी बिना कुछ सोचे विचारे जहां जगह मिली वही आवास बनाकर बस गई तथा शहरों एवं मानव बस्तियों के एक किनारे से बहने वाली नदियां आज शहरों के मध्य में आ गई हैं जिससे जल की मात्रा बढ़ जाने पर उनका जल नदी की सीमा तोड़कर शहरों एवं मानव बस्तियों में सहज रूप में प्रवेश कर जाता है और वहां सैलाब की स्थिति उत्पन्न कर देता है । आज छोटे कस्बों से लेकर बड़े शहरों तक चारों ओर अनियंत्रित निर्माण से कंक्रीट के जंगल उग आये हैं , भवनों के अंधाधुंध निर्माण होने तथा उसके सापेक्ष जल निकासी की व्यवस्था सुनिश्चित न किए जाने से जल निकासी व्यवस्था चरमरा गई और शहरों की जल निकासी क्षमता जवाब दे गयी। जीवन को सुखमय बनाने की अंधी दौड़ ने गांव की आबादी को शहर की ओर धकेला ,जिससे शहरों की आबादी एवं जनसंख्या घनत्व में अप्रत्याशित वृद्धि हुई। 2011 की जनगणना के अनुसार देश के 27 करोड़ से अधिक लोग शहरों में निवास करते हैं। देश में 7935 कस्बे हैं उनमें से 468 ऐसे हैं जिनकी आबादी कम से कम एक लाख है 

‌।इन्हीं में से 53 की आबादी 1000000या उससे अधिक है।।सन 1971 में जहां देश में एक लाख से अधिक आबादी के मात्र 151 शहर थे अब उनमें 100% की वृद्धि होकर उनकी संख्या 300 से अधिक पहुंच गई है, इसी प्रकार 10 लाख से अधिक आबादी वाले शहर भी बढ़कर 16 हो गए । निकट भविष्य में देश की आबादी की 40% जनसंख्या शहरों में ही निवास करने लगेगी।दिल्ली कोलकाता बंगलुरु अहमदाबाद मद्रास पटना मुंबई कानपुर जैसे महानगरों में जल निकासी की सुचारू व्यवस्था न होने के कारण वर्षा होते ही इन शहरों में जल निकासी की समस्या भयंकर रूप धारण कर लेती है। इस समस्या के मूल में शहरों की सैकड़ों वर्ष पुरानी सीवर और जल निकासी व्यवस्था है, जो शहरों के वर्तमान आबादी एवं क्षेत्र के सामान्य भार को ढोने में सक्षम न होने के कारण अकस्मात जल में वृद्धि हो जाने पर जवाब दे जाती है और शहर मेंजल वृद्धि एवं जलभराव की समस्या उत्पन्न होती है। देश में कोलकाता में सबसे पुरानी ड्रेनेज प्रणाली है। यहां पर पहला ईटों से बना सीवर सिस्टम 1876 में शुरू हुआ था। उस समय इसे 6.35 मिली मीटर प्रति घंटा बारिश के पानी को दृष्टि में रखकर डिजाइन किया गया था करीब 100 साल बाद आज 12.7 मिलीमीटर प्रति घंटा बारिश के पानी को निकालने के लिए तैशर करने की कोशिशें की गई है , जबकि आज की अनियमित वर्षा में इससे काफी अधिक वर्षा प्रतिवर्ष हो जाती है। 2003 में सिर्फ 1 घंटे में ही 54 मिलीमीटर बारिश बाढ़ का कारण बनी थी। कमोबेश यही स्थिति देश के प्रत्येक पुराने शहर की बनी हुई है।

पुराने शहरों की जल निकासी एवं सीवर व्यवस्था जर्जर हो चुकी है, जिस में व्यापक स्तर पर संशोधन एवं नव निर्माण की आवश्यकता है किंतु इस दिशा में कोई सार्थक कार्य तो होता नहीं अपितु उसके स्थान पर सीवर एवं नालियों की सफाई के नाम पर लगभग प्रत्येक शहर में करोड़ौं का बजट सरकारी अमले एवं व्यवस्थापकों द्वारा लूट लिया जाता है और सीवर तथा जल प्रवाह प्रणाली को राम भरोसे छोड़ दिया जाता है ।नाली एवं सीवर की सफाई की ओर वर्षा ऋतु आने के पूर्व तक कोई ध्यान नहीं देता और बरसात हो जाने पर एक-दो दिन शहर में कहीं एक आध स्थान पर साफ सफाई किए जाने का प्रदर्शन कर बंद कर दिया जाता है ।परिणाम स्वरूप नदी नाले और सीवर न साफ होते हैं और न उनकी गाद बाहर निकल पाती है, मानव अपशिष्ट तथा भवन निर्माण सामग्री से आपूरित मिट्टी एवं गंदगी से सटे नाले वर्षा जल को अपने साथ ले जाने में सक्षम नहीं हो पाते, जिससे शहरों में जलभराव की असामान्य स्थिति उत्पन्न हो जाती है और शहर की सड़कें दरिया का रूप धारण कर लेती हैं।शहरों में आने वाली बाढ़ की समस्या के समाधान के लिए नालों की साफ-सफाई कर उसकी गाद निकालने के साथ ही साथ उनका आकार बढ़ाने के काम को भी प्राथमिकता के साथ करना होगा । इसके साथ ही शहरों के ड्रेनेज सिस्टम में विद्यमान कमियों को दूर कर इन्हे वर्तमान स्थिति के अनुरूप वर्तमान अपशिष्ट जल के वहन योग्य बनाना होगा क्योंकि ड्रेनेज सिस्टम में विद्यमान अव्यवस्था और उसकी कमियों के कारण ही शहरों की जल निकासी की व्यवस्था लगभग समाप्त हो गई है । शहरों के ड्रेनेज सिस्टम के काम न करने का मुख्य कारण उनका ठीक-ठाक रखरखाव, तथा सही ढंग से संचालन का अभाव ही है। ड्रेनेज सिस्टम को सही ढंग से न सुधारा गया तो हालात और भी खराब होते जाएंगे और शहरों की जल निकासी की समस्या विकराल रूप धारण करती जाएगी।

वर्षा ऋतु के प्रारंभ में ही इस वर्ष राजस्थान मध्य प्रदेश महाराष्ट्र उत्तर प्रदेश असम झारखंड बिहार उत्तराखंड गुजरात छत्तीसगढ़ कर्नाटक केरल और उड़ीसा में अधिकांश शहरों में पानी घुस गया। मुंबई दिल्ली जयपुर देहरादून कानपुर जैसे शहरों में वर्षा का पानी सैलाब बनकर सड़कों में भर गया और शहरों की सड़कें दरिया बन गई जहां नाव के स्थान पर बड़ी-बड़ी गाड़ियां मोटर कार एवं बाईके बहती तैरती हुई नजर आई। भवनों के भूतल पानी से लबालब भर गए ,उनमें रहने वाले लोगों को उनकी छतों एवं दूसरी मंजिलों का सहारा लेना पड़ा। शहरों में आई बाढ़ नदियों में आने वाली बाढ़ की ही तरह विनाशकारी एवं जनजीवन को अस्तव्यस्त करने वाली रही। शायद ही कोई ऐसा शहर बचा हो जहां बरसात में सड़कों में गाड़ियां बहती हुई नजर ना आई हो। प्रगति एवं विकास की दौड़ में सबसे आगे चल रहे मुंबई बैंगलोर एवं दिल्ली की स्थिति तो सबसे बुरी थी चारों ओर पानी ही पानी , बाढ़ का अप्रतिम दृश्य , जो नदियों में आने वाली बाढ़ को भी पीछे छोड़ रहा था, कई दिनों तक देखने को मिलता रहा। शहर के अंदर विद्यमान उपंरिगामी पुलों के नीचे इकट्ठे हुए पानी ने तो बड़ी-बड़ी गाड़ियों को भी डुबो दिया। ना जाने कितनी कारें एवं बाइके बह गई । दिल्ली में तो उसके दिल राजीव चौक के पास स्थित मिंटो ब्रिज के नीचे एक वाहन चालक कि पानी में डूबकर मृत्यु ही हो गई, शहरों में आई बाढ़ को लेकर शायद यह पहला वाकया होगा जब सड़कों में आई बाढ़ में किसी व्यक्ति की मृत्यु हुई हो और वह भी राजधानी दिल्ली के हृदय स्थल में।

प्राचीन काल में वर्षा जल के संग्रहण के लिए जल स्रोतों का निर्माण कराया जाता था। गांव एवं शहर सभी में जल संचयन की उत्तम व्यवस्था हुआ करती थी । आबादी के साथ-साथ कुआ तालाब बावड़ियों का जाल बिछा हुआ था। राज परिवार तथा धनी मानी व्यक्ति जीव जगत के कल्याण हेतु जल संग्रहण की इच्छा से कुआ तालाब तथा बावड़ियों का निर्माण कराया करते थे जिससे जहां एक और इनके प्रभाव से भूगर्भ का जल स्तर काफी ऊंचा हो जाता था वहीं दूसरी ओर जीव जगत के लिए उसकी आवश्यकता अनुसार पर्याप्त मात्रा में पानी भी सहज रूप में उपलब्ध हो जाता था,। इन कुआ तालाब एवं बावड़ियों में इनकी संग्रहण क्षमता के अनुसार वर्षा का जल एकत्र हो जाता था जिससे एक साथ जल की मात्रा बढ़ नहीं पाती थी और वह नियंत्रित हो जाता था। अब विकास की दिशा में इन प्राकृतिक एवं मानव निर्मित जल संसाधनों का आज कोई महत्व नहीं रह गया , परिणाम स्वरूप अपने आगोश में जल की अगाध राशि को समेट लेने वाले यह जल संसाधन मृतप्राय हो गए हैं ।कोई इनकी सुध लेने वाला नहीं है। यह जल स्रोत वर्षा ऋतु में प्राप्त जल का संग्रहण कर भूगर्भ के जल के स्तर को बढ़ाते हुए वर्ष पर्यंत न केवल जीव जगत को उनकी आवश्यकता अनुसार जल उपलब्ध कराते थे अपितु भूगर्भ के जल स्तर को भी बढ़ाकर जल की उपलब्धता सुनिश्चित करते थे किंतु अब इन जल स्रोतों की ओर ध्यान न दिए जाने से यह समाप्ति के कगार पर पहुंच गए हैं , जिसका परिणाम है भूगर्भ जल स्तर का निरंतर गिरते जाना और लगभग समाप्त हो जाना। बैंगलोर दिल्ली नैनीताल जैसे अनेक शहरों में जहां झीलें पर्यटन की दृष्टि से अपना महत्वपूर्ण स्थान रखती थी तथा लोगों को सहज रूप में आकर्षित करती थी आज अपना अस्तित्व लगभग खो चुकी हैं। नैनीताल की झील जो कभी 22 वर्ग किलोमीटर में फैली हुई थी अब सिकुड़ कर 8 वर्ग किलोमीटर में ही रह गई है। प्रयागराज भोपाल दरभंगा पटना आदि शहरों के तालाब लगभग समाप्त हो चुके हैं। 5000 से अधिक छोटी छोटी नदियां अपना अस्तित्व खो चुकी हैं तथा 20,000 से अधिक तालाब एवं झीलें गायब हो गये हैं । देश के अनेक शहरों मैं झीलों तालाबों जोहडों एवं बावड़ियों के साथ यही हुआ ।सरकारी आंकड़ों के अनुसार स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात लगभग 70 सालों में 70,000 से अधिक कुवांऔर तालाबों ने अपना अस्तित्व खो दिया है ,जो कभी जल की अगाध राशि को अपने आप में समेटकर जल प्लावन के दृश्य को उपस्थित नहीं होने देते थे ।आज उनके अभाव में वर्षा का थोड़ा भी जल इकट्ठा होकर जल प्लावन का दृश्य उपस्थित कर देता है। कभी कुवां, बावड़ियों आदि का निर्माण करना अपने आप में एक वंश परंपरागत रोजगार परक कलात्मक कार्य था जिसके लिए समाज का एक वर्ग सदैव उपलब्ध था किंतु अब इनके महत्वहीन हो जाने के कारण इनके निर्माण की कला भी लगभग लुप्त हो जा रही है , भविष्य में कभी पुन: इनकी आवश्यकता पड़ने पर इन कुशल कर्मकारों का मिल पाना भी असंभव हो जाएगा। जल संचयन केंद्रों एवं जल स्रोतों के अस्तित्वहीन होते जाने से जल संचयन की समस्या विकराल रूप धारण करती जा रही है और वर्षा का जल अबाध गति से मनमाने ढंग से बहकर जलप्लावन की स्थिति उत्पन्न करने लगा है।

आज बड़ी-बड़ी नदियों के किनारे स्थित अनेक शहर अपने भूगर्भ के जल को खो चुके हैं और वह शहर डार्क जोन की स्थिति में आ गए हैं , जहां भूगर्भ का जल समाप्त हो चुका है और ग्रीष्म ऋतु में जल के लिए हाहाकार मच जाता है। विकास की इस अंधी दौड़ ने न केवल कुआ , तालाब , बावड़ी , जोहड़ आदि को महत्वहीन बनाकर उन्हें समाप्ति के कगार पर खड़ा कर दिया है जिससे वहआज अपना मूल्य खो चुके हैं अपितु उनके साथ ही अनेक छोटी-छोटी नदियां तथा तालाब एवं झील भी विकास की बलि चढ़चुके हैं और उनके स्थान पर कंक्रीट के जंगल उग आए हैं ।मानव निर्मित यह बस्तियां जल प्रवाह की सहज दिशा एवं गति को बाधित कर उसे सहज रूप में न बहने देकर उसके सामने एक तरह से दीवार खड़ी कर दी है, जिसके चलते वर्षा ऋतु में वर्षा का जल अपना सहज प्रवाह पथ न पाकर मनमाने ढंग से बहता हुआ समस्त बंधनों को तोड़कर बस्तियों में प्रवेश कर जाता है और शहर की सड़कों को जलमग्न कर वहां सैलाब की स्थिति उत्पन्न कर देता है।

सिंचाई एवं जल विद्युत परियोजनाओं को दृष्टि में रखकर नदियों में स्थान स्थान पर बांध बनाए जा रहे हैं तथा इन बांधों के जल संग्रहण क्षेत्र में वर्षा ऋतु में नदियों के जल को रोककर इकट्ठा किया जाता है किंतु कभी-कभार वर्षा ऋतु में जल संग्रहण क्षेत्र में उसकी मात्रा क्षमता से अधिक बढ़ जाने पर इन बांधों के द्वार खोल दिए जाते हैं, जिससे इकट्ठा वर्षा का जल प्रबल वेग के साथ आगे बढ़ता है और सामान्य क्षेत्र में तो वह मुक्त प्रवाह पथ पा जाने परअपनी गति के साथ बढ़ता रहता है किंतु शहरी क्षेत्रों के समीप पहुंचकर तटवर्ती मैदान के अभाव में वह तटबंधों को तोड़कर पुस्तों की बस्तियों एवं शहरों में भी बाढ़ की स्थिति को उत्पन्न कर देता है । नदियों में बांधों का अंधाधुंध निर्माण भी इस समस्या का एक कारण बन जाता है, जिसके दृष्टिगत बांधों के निर्माण , उन में संग्रहीत जल तथा उस जल के निकासी के संदर्भ में हरदम सजग रहने की आवश्यकता है, किंतु इस ओर ध्यान न देकर बांध बनाने की योजना तो बना ली जाती है किंतु उस से आने वाली विपदाओं और समस्याओं के समाधान की आवश्यकता ही नहीं समझी जाती। फलस्वरूप बरसात की स्थिति आने पर गंभीर समस्या का सामना करना पड़ता है। एशियन विकास बैंक का अनुमान है कि भारत में जलवायु परिवर्तन संबंधी सभी आपदाओं में बाढ़ की हिस्सेदारी लगभग 50% है । केंद्रीय जल आयोग के 1952 से 2018 के डाटा से पता चलता है कि 68 साल में एक भी साल ऐसा नहीं रहा है जब बाढ़ के कारण देश को जीवन और संपत्ति का बड़ा नुकसान न उठाना पड़ा हो ।इस अवधि के दौरान 1.09 लाख लोगों तो मौत का सामना करना पड़ा और 25 .80 करोड़ हेक्टेयर की फसल बर्बाद हो गई। साथ ही 8.11 करोड़ भवनों को नुकसान पहुंचा । देश को इन छह दशकों में बाढ़ के कारण 4.7 लाख करोड़ रुपए की छाती उठानी पड़ी ।अकेले 2018 में देश को बाढ़ के कारण ₹95736 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ।

आज आवश्यकता , शहरों के ड्रेनेज एवं सीवर सिस्टम को वर्तमान आवश्यकता के अनुसार दोनों को अलग अलग बनाने की है। अनेक शहरों में दोनों कार्यों को एक ही सिस्टम के माध्यम से संचालित किया जा रहा है, जिससे जल प्रवाह बाधित होने के कारण विद्यमान सिस्टम अपना कार्य कुशलता के साथ नहीं कर पाता और शहर में जलभराव तथा गंदगी की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। शहरों में पानी का ऐसा प्रबंध होना चाहिए कि जलभराव नदियों और बांधों में हो, जिससे अचानक हुई बरसात के पानी का उपयोग जल की कमी से जूझ रहे क्षेत्रों में किया जा सके। साथ ही शहरों की बढ़ती आबादी को नियंत्रित करने के साथ साथ भवनों के अनियंत्रित निर्माण को भी नियंत्रित करना होगा । शहरी क्षेत्र या इसके केचमेंट एरिया में भारी बारिश के पानी के बहाव या निचले इलाकों में निर्माण कुछ ऐसे कारण हैं जिनके एक साथ होने से भयंकर बाढ़ का सामना करना पड़ता है। नदियों के प्रवाह मार्ग के समीप नव निर्माण पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाना होगा जिससे नदियों के जल को बाढ़ के समय फैलने के लिए पर्याप्त स्थान मिल तथा उसे आबादी में प्रवेश करने का अवसर ही ना मिले। नियंत्रित तथा सुविचारित निर्माण योजनाओं को महत्व देते हुए निर्माण कार्य योजनाबद्ध ढंग से ड्रेनेज एवं सीवर सिस्टम को बनाते हुए करना होगा, जिससे वर्षा का जल अनियंत्रित होकर यहां वहां न फेल कर त्वरित गति से बहते हुए नदी नालों के माध्यम से अपने गंतव्य स्थल तक पहुंच सकेगा। यदि शहरों में सुव्यवस्थित ड्रेनेज एवं सीवर सिस्टम न बना तो जल निकासी की समस्या सदैव बनी रहेगी, सीवर सिस्टम के नवनिर्माण के साथ पुराने ड्रेनेज एवं सीवर सिस्टम की समय से साफ सफाई तथा वर्षा आने से पूर्व शहर के समस्त नालो से उनकी याद को अनिवार्य रूप से निकालने की व्यवस्था सुनिश्चित करना ड्रेनेज सिस्टम को सुचारू रूप से चलाने की प्रथम आवश्यकता है। यदि समय से सीवर सिस्टम नालियों एवं नालों की सफाई न की गई तो शहरों में सैलाब का दृश्य प्रतिवर्ष उपस्थित होता रहेगा और अपार धन जन हानि होती रहेगी। गंदे नालों की साफ-सफाई और सीवर सिस्टम को दुरुस्त कर शहरों की इस समस्या से काफी हद तक निजात पाई जा सकती है।