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मार्क्सवादियों-माओवादियों का गांधी प्रेम, कितना झूठ-कितना सच           
November 19, 2019 • आचार्य श्री विष्णुगुप्त

 

 

 


   

 


मार्क्सवादियों-माओवादियों कट्टरपंथियों, हिंसकों, तानाशाही के सहचरों का महात्मा गांधी प्रेम आश्चर्यजनक है। पूरे देश के अंदर यह देखा जा रहा है कि मार्क्सवादी-माओवादी के हिंसक सहचरों और इनके विचाराकों का गांधी प्रेम किसी न किसी रूप में प्रकट हो रहा है, देश की समस्याओं या फिर वर्तमान सत्ता द्वारा खडे किये गये प्रश्नों का उत्तर गांधी के विचारों से देने की कोशिश कर रहे हैं और जनांदोलनों को खडा करने के लिए मार्क्स या माओ की गांधी को सामने खडे कर रहे हैं। यह वर्ष गांधी के चंपारण यात्रा की शताब्दी वर्ष है। आज के सौ साल पहले गांधी ने चंपारण के किसानों के शोषण के खिलाफ अलख जगाया था और पूरे देश के किसानों को एक सूत्र में बांध कर आजादी के लिए प्रेरित किया था। गांधी के इस चपारण यात्रा के शताब्दी वर्ष को मनाने और उसके संदेशों को किसानों तक पहुंचाने के लिए कार्यक्रमों के आयोजनों में मार्क्सवादी और माओवादी आगे -आगे हैं, मार्क्सवादियों और माओवादियों द्वारा आयोजित कई कार्यक्रमों मे मेरी खुद की उपस्थिति रही है और जो कभी गांधी को खुलेआम गालियां देते थे, गांधी को मजबूरी व समर्पण करने के प्रतीक कहते थे, उपनिवेशवाद का प्रहरी और दलाल कहते थे के मुख से गांधी की बडाई सुनना, सत्य-अहिंसा को ही मार्ग दर्शक मानना भ्रम पैदा करता है। क्या इनका गांधी प्रेम सच है? क्या इनका गांधी प्रेम झूठ है, दिखावा है? क्या मार्क्सवाद-माओवाद अब उतना कारगर हथियार नहीं रह गया जो देश के जनमानस में अपनी जगह सुनिश्चित करने के प्र्रेरक का काम करता था? क्या ये गांधी के सत्य और अहिंसा को हथियार बना सकते हैं? अगर हां तो फिर इनके मार्क्सवादी दर्शन और मोआवादी हिंसा की प्रवृतियों का अस्तीत्वहीन मान लिया जाना चाहिए? दुनिया के मजदूरों एक हो का एकमेव राजनीतिक प्रक्रिया की जगह खेत-खलियान और किसान को याद करना इनकी कौन सी मानसिकता या मजबूरी को साबित करती है? सुनिश्चित तौर पर मार्क्सवादी-माओवादी हाशिये पर खडे हैं, इनकी हिंसा और देशद्रोहिता का हथियार कोई काम के नहीं रहे। अब इन्हें गांधी के सत्य, अहिंसा और सत्याग्रह ही वह हथियार दिख रहा है जिसके माध्यम से ये अपनी खोई हुई शक्ति पाने, नई शक्ति बनाने के लिए उतावले हैं।
              मार्क्सवादियों और माओवादियों का भारतीय दर्शन विलुप्त है, कई प्रेरक संस्कृतियां हैं, कई महापुरूष हुए हैं, कई प्रेरक विचारधाराएं हैं जो मानवता और समानता के अधिकार के लिए संघर्षरत थे पर मार्क्सवादियों और माओवादियों ने उन महान संस्कृतियों को और महापुरूषों को प्रेरणा स्रोत बनाने की कभी जरूरत ही नहीं समझी। महात्मा गांधी से लेकर स्वामी विवेकानंद, कबीर से लेकर महाप्रभू चैतथ्य तक एक से बढकर एक महापुरूष हुए हैं जिन्होंने त्याग और परिवर्तन की गाथा लिखी थी ने कभी इन्हें प्रभावित नहीं किया। ये सिर्फ मार्क्स, माओ और स्तालीन के शिष्य बने रहे है जिन्हें हिंसा पसंद थी, जिन्हें तानाशाही पंसद थी, लोकतंत्र इन्हें पंसद नही था, जनवादी न होने के बावजूद ये अपने आप को जनवादी कहते रहे, तानाशाही कायम रखने के लिए रूस में लेनिन और स्तालीन ने लाखों विरोधियों को मौत का घाट उतारे थे। सोवियत संघ के पतन के बाद कब्रो की खुदाई में लेनिन और स्तालीन की बर्बरता, अमानवीयता और खूनी हिंसा साबित होती है। माओत्से तुंग ने कहा था कि सत्ता बन्दूक की गोली से निकलती हैं। आज देश भर में माओवादी सत्ता बन्दूक की गोली से निकलती है के रास्ते पर चलकर लोकतंत्र की पद्धति के खिलाफ और तानाशाही कायम करने के लिए हिंसा जारी रखे हैं। पश्चिम बंगाल में इनकी 30 सालों तक सत्ता रही पर हिंसा और गुडर्इ्र के अलावा पश्चिम बंगाल में खासकर किसानो का कौन सा विकास हुआ है, यह भी देखने की जरूरत होनी चाहिए।
             गांधी को मजबूरी की मूर्ति किसने कहा था, गांधी को अंग्रेजों का दलाल किसने कहा था, गांधी को उपनिवेशवाद का प्रहरी किसने कहा था, गांधी को जनवाद का दुश्मन किसने कहा था, गांधी को व्यापारियों का नेता किसने कहा था, गांधी के हिन्दुओं का नेता किसने कहा था। इतिहास के झरोखे में यह सब उपस्थित है कि ये सभी बातें कम्युनिस्टों ने बोली थी, मार्क्सवादियों ने बोली थी? 1942 का भारत छोडो आंदोलन का विरोध किसने किया था। कम्युनिस्टों ने 1942 के भारत छोडों आंदोलन का विरोध करते हुए कहा था कि गांधी अंग्रेजों को बाहर भगाने के पक्षधर नहीं हैं, वे सिर्फ नाटक कर रहे हैं। जबकि आंजादी के आंदोलन में यह सुनिश्चित हुआ कि भारत छोडो आंदोलन ही अंग्रेजों को भारत छोडने के लिए अंतिम कील साबित हुआ था। गांधी की लंगोटी में, गांधी की लाठी में, गांधी के चश्में में मार्क्सवादियों ने देश के अंतिम पक्ति के पीडित नागरिक का दर्शन क्यों नहीं किये,इन्हें समानता क्यों नहीं दिखी? गांधी के सत्य और अहिंसा के प्रति समर्पण में मार्क्सवादियों ने सांप्रदायिक हिंसा या फिर सभी प्रकार की समयाओं का समाधान क्यों नहीं देखा? दुनिया में अब यह सुनिश्चित हो चुका है कि सभी प्रकार की हिंसक और अहिंसक समस्याओं का समाधान  गांधी के सत्य और अहिंसा में ही निहित है। अगर मार्क्सवादियों ने गांधी की लगौटी, लाठी और चश्में में भारतीयता देख ली होती, अंतिम व्यक्ति की छवि देख ली होती तो निष्चित तौर पर कहा जा सकता है कि भारत में मार्क्सवाद और माओवाद की इतनी बडी दुर्गति नहीं होती और आज ये हाशिये पर खडे नहीं होते बल्कि सोवियत संघ के पतन के बाद भी ये भारत की राजनीति के मुख्य धारा के प्रहरी होते।
                  किसान इनकी प्राथमिकता में कब रहे है? इनकी प्राथमिकता में किसान कभी नहीं रहे हैं। इनकी प्राथमिकता में तो केवल मजदूर रहे हैं। इसीलिए ये दुनिया के मजदूरों एक हो का नारा देते थे। ये समझते थे कि सिर्फ मजदूर ही बदत्तर होते है, ये ही शोषित होते हैं, इसीलिए इनका आंदोलन किसानों के खिलाफ भी होता था। किसान पर इनका आंदोलन अधिक मजदूरी दिलाने के लिए होता था। अधिक मजदूरी की मांग को लेकर खेती का बहिष्कार भी इनका एक मुख्य राजनीतिक हथियार हुआ करता था। मजदूर कब मजबूत होगे? मजदूर तभी खुशहाल होगे जब किसान खुशहाल होंगे, उधोग-धंधे भी मुनाफे में होंगे। इसलिए मजदूर की खुशहाली के लिए किसानों की खुशहाली जरूरी है, उधोग-धंधों की खुशहाली जरूरी है। पर कम्युनिस्टो ने किसानों और उद्योग-धंधों की खुशहाली के लिए कब सोची थी। कम्युनिस्टों पर यह आरोप हैं कि इन्होंने दुनिया के मजदूर एक हो के चक्कर मे किसानों और छोटे-उद्योग धघों का सर्वनाश किया है। यह आरोप कुछ हद तक सही भी हैं। अगर इन्हें सही में किसानों से प्रेम था, इनकी प्राथमिकता में किसान थे तो फिर महात्मा गांधी से पहले कोई कम्युनिस्ट चंपारण क्यों नहीं गया था। गांधी के किसान सत्याग्रह को कम्युनिस्टों ने ढकोसला क्यों कहा था? पश्चिम बंगाल, केरल या त्रिपुरा जहां पर कम्युनिस्ट शासन रहे हैं वहां पर भी किसानों की स्थिति कोई अच्छी क्यों नहीं बनी? पश्चिम बंगाल के सिंदुर और नंदी ग्राम में जबरन किसानों की भूमि छीनने की कोशिश किसने नहीं देखी थी, तत्कालीन मार्क्सवादी सरकार ने सिन्दुर और नंदी ग्राम में किस प्रकार से उत्पीडन का खेल खला था और किसानों को उनकी जमीन से बेदखल करने की कार्यवाही की थी, यह भी जगजाहिर है।
कम्युनिस्टों की दो धाराएं हैंे। एक धारा तानाशाही प्रवृति की है जिसे माओवादी कहते है जबकि दूसरी धारा में संसदीय राजनीति के खोल में कम्युनिस्ट पार्टियां हैं जिनमें मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी प्रमुख है। मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी शुद्धरूप से चीन का मोहरा है जो अभी तक चीन को आक्रमणकारी नहीं मानता है और जिनकी प्रतिबद्धता चीन के साथ है जबकि भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की प्रतिबद्धता सोवियत संघ के साथ रही थी, यह पार्टी आपातकाल का गुनहगार भी है। उल्लेखनीय है कि भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने इंदिरा गांधी की तानाशाही का समर्थन किया है, इन पर समर्थन करने का आदेश सोवियत संघ का था।  अभी भी ये कम्युनिस्ट राजनीतिक पार्टियां अधिकाररिक तौर पर गांधी को लेकर सहिष्णुता दिखाने के लिए तैयार नहीं है। पर कम्युनिस्ट पार्टियों के कार्यकर्ता और तथाकथित विचारक गांधी को लेकर सहिष्णुता रखने कि लिए विवश हैं और गांधी के चपारण सत्याग्रह को हथकंडा बना कर फिर से जनमानस में अपनी छाप छोडना चाहते हैं।
            कोई मार्क्सवादी-माओवादी सिर्फ गांघी के चंपारण सत्याग्रह पर सहानुभूति दिखा कर, दिखावे के लिए कार्यक्रम कर या फिर गांधी के सत्य और अहिंसा पर शोर मचाकर किसानों के दिल में जगह नहीं बना सकते हैं। जब कम्युनिस्ट जमात गांधी की लगोटी, लाठी और चश्मे का असली मकसद समझेंगे और हिंसा व तानाशाही अलग होंगे तभी उन्हें किसान वर्ग या फिर देश की अन्य जनता सत्ता सौपने के लिए तैयार होंगी? 

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