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सैफई मेडिकल यूनिवर्सिटी कोरोना का इलाज खोजने के करीब : प्रो. राजकुमार
June 2, 2020 • विशेष प्रतिनिधि • Health

कोविड-19 संक्रमितों पर अब तक किए गए प्रयोग बेहद सफल

इटावा। यूपी के इटावा जिले के ग्रामीण क्षेत्र में स्थापित इकलौती सैफई मेडिकल यूनिवर्सिटी के डॉक्टर विश्वव्यापी महामारी कोविड-19 का इलाज खोजने के बेहद करीब पहुंच गए हैं। हॉस्पिटल में भर्ती कोरोना संक्रमित मरीजों पर किए गए प्रयोग बेहद सफल साबित हुए हैं। इस पर आगे काम करने के लिए एक कमेटी बनाई गई है, जिसकी मॉनिटरिंग खुद वाइस चांसलर प्रो. राजकुमार कर रहे हैं। जाने माने न्यूरोलॉजिस्ट प्रो. राजकुमार ने इस बाबत टॉप स्टोरी के साथ लंबी बातचीत की। पेश है मुख्य अंश :

सवाल : कोरोना वायरस कितनी प्रभावी भूमिका में लोगों को परेशान कर रहा है, अध्ययन क्या कहता है?

जबाव : कोराना को लेकर जिस प्रकार से पूरे विश्व में हाहाकार मचा हुआ है, चाहे वो अमेरिका हो, इंगलिस्तान हो या फिर मिडिल ईस्ट के देश। लेकिन, भारत में स्थिति सामान्य और नियन्त्रण में है। इसके कई कारण हैं। इसमें सबसे पहला कारण है कि हमारे देश में पहले से ही बीसीजी का जो टीकाकरण हो रहा है, जो कि एक यूनिवर्सल प्रोग्राम के तहत पूरे देश में किया जाता है, जो नवजात शिशु को दिया जाता है। यह टीका सिर्फ टीवी (क्षयरोग) के लिए प्रयोग नहीं किया जाता है, बल्कि हिट्रोलोगस प्रतिरोधकता प्रदान करता है। इस करण हमारे देश में कोरोना के लिए भी एक प्रकार की प्रतिरोधकता प्रदान करता है। यही दूसरी तरफ हमारे देश की 40 प्रतिशत आबादी दैनिक कामगार है, जो मेहनत मजदूरी करके अपना भरण पोषण करते हैं। इनकी भी रोग प्रतिरोधकता बहुत अच्छी होती है। तीसरी बात यह है कि हमारा देश में विविध जलवायु का है, जिसके कारण भी हमारे देश में इसका प्रसार नहीं हुआ है। मेरा मानना है कि जैसे- जैसे गर्मी के साथ-साथ आर्द्रता बढ़ेगी, मतलब जब 35 डिग्री तापमान के साथ आर्द्रता 90 प्रतिशत होगी और यह स्थिति अगर 5-6 दिन बनी रही तो कोरोना का प्रसार लगभग रूक जायेगा। इसे ऐसे भी कह सकते हैं कि इसका प्रसार व्यक्ति से व्यक्ति को हो सकता है, परन्तु निर्जीव वस्तुओं से इसका प्रसार रूक जायेगा। हमारे देश में जो आम व्यक्ति खान-पान में मसालों का प्रयोग करता है, उनमें भी ऐसे तत्व होते हैं, जो हमारे शरीर की रोग प्रतिरोधकता को बढ़ाते हैं। इसी वजह से कोरोना के मामले में मृत्यु दर लगभग 3 प्रतिशत से भी कम है। जबकि विश्व में लगभग 6 प्रतिशत है। हमारे उत्तर प्रदेश में तो यह दर और भी कम लगभग 2.2 प्रतिशत ही है।

सवाल : सैफई के कोविड अस्पताल में आये कोरोना संक्रमितों को आप और आपकी टीम ने कैसे स्वस्थ किया?

जबाव : जब देश में करोना आने की आशंकाएं व्यक्त की जाने लगीं, तभी से हमारे संस्थान में इस पर अध्ययन आरम्भ कर दिया गया। इसके लिए एक टीम का भी गठन कर किया गया। सबसे पहले हमने अध्ययन किया कि कोरोना शरीर में किन-किन हिस्सों को प्रभावित करता है। इसके क्या क्या प्रभाव हो सकते हैं, जिससे रोगी की मृत्यु हो सकती है। इसके बाद हमने उन दवाओं का अध्ययन शुरू किया, जो प्रभावित अंगों पर काम करती है और उनको चिह्नित किया। उसके बाद हमने चिह्नित दवाओं के बारे में जानकारियां एकत्रित कीं। हमारे संस्थान में आये 103 रोगियों में से हमने 20 रोगी ऐसे चिह्नित किये, जिन्हें हम चिह्नित दवायें दे सकते थे। रोगियों को दवा देने से पहले सभी औपचारिता पूर्ण करते हुए उनका इलाज आरम्भ किया और 5 से 6 दिन वह पूर्ण रूप से स्वस्थ्य हो गये। इसके लिए हम जिस औषधि का प्रयोग कर रहे हैं, उसे हम राज निर्माण वटी कहते हैं। इसे 125-125 मिली ग्राम सुबह-शाम शहद के साथ देते हैं। इसके अन्य कोई भी दुष्परिणाम नहीं है। हालांकि मुझे इस बात की खुशी है कि हमारे देश ने इस रोग के उपचार के लिए दवा खोज ली है। लेकिन, और अधिक रोगियों को इस दवा से रोग मुक्त करने बाद ही इसकी गारंटी ले सकता हूं। इसके अलावा अन्य रोगियों को राज निर्माण काढ़ा दिया जा रहा है। इसे आमजन तक पहुचान के लिए जो औषधियां सामान्य रूप से एक रसोई में मिल सकती है, प्रसारित भी कराया। इसके साथ ही रोगियों को पौष्टिक आहार के साथ व्यायाम आदि कराया। इन सभी गतिविधियों को संकलित कर बड़े स्तर की शोध पत्रिका में प्रकाशन व अनुसंधान के लिए भेजेंगे। जैसे ही उसके परिणाम आते हैं, हम इसका प्रयोग बड़े पैमाने पर करेंगे।

सवाल : जो 83 मरीज दुरुस्त किये गये हैं, उनमे कितनी कम और अधिक उम्र के मरीज थे?

जबाव : जो रोगी आगरा से आये थे, उनमें एक 11 माह का बच्चा भी था, जो कि सबसे कम उम्र का था। सबसे अधिक 80 वर्ष के बुजुर्ग भी इस रोग से प्रभावित पाये गये हैं। हमारे द्वारा ऐसे कोविड मरीजों का इलाज किया गया है जो उच्च रक्त चाप, मधुमेह, हदय रोग आदि से भी प्रभावित थे। वह अब रोग मुक्त हो चुके हैं। इन रोगियों को हमने अन्य दवाओं के साथ ही साथ राज निर्माण काढ़ा सुबह-शाम दिया और इसका प्रचार प्रसार कराया।

सवाल : कोरोना वायरस का असर इंसान के उपर कैसे होता है?

जबाव : जब कोई भी व्यक्ति इससे संक्रमित होता है तो इसके रोगाणु शरीर में 6 से 14 दिन के अन्दर बहुत ही तीव्रगति से बढ़ता है। उसके बाद इसके लक्षण दिखाई देते हैं। इसके लक्षणों में मुख्यत: रोगी को उच्च ताप का ज्वर आता है। कुछ लोगों में ज्वर के साथ ही साथ सूखी खांसी आती है, परन्तु कुछ में ज्वर के साथ ही साथ बलगम के साथ खांसी आती है। जिसके कारण शरीर में टूटन, जी मिचलाने का भी अनुभव होता है और सांस लेने में दिक्कत होती है। अधिकतर रोगियों को स्वसन तंत्र व फेफड़ों में संक्रमण के कारण ऑक्सीजन की शरीर में आपूर्ति नहीं हो पाती है, जिससे शरीर के अन्य अंग प्रभावित होते हैं।

सवाल : सैफई मेडिकल यूनिवर्सिटी में कोरोना पर अध्ययन किया गया है। कोरोना वायरस के पीड़ितों के उपचार के लिए क्या कार्ययोजना बनाई है?

जबाव : कोरोना संक्रमितों को लेकर पायलट स्टडी की गई है। अभी हम जिन मरीजों पर यह स्टडी कर चुके हैं, उनके नतीजों से उत्साहित हैं। इसको अभी और बढ़ाने जा रहे हैं। संक्रमितों और गैर-संक्रमितों पर अध्ययन किया जा चुका है। 20 संक्रमितों पर दवा का अध्ययन सफल भी हुआ है, लेकिन अभी इसको लेकर कोई जल्दीबाजी नहीं है। इसलिए कुछ समय अभी और इंतजार करना होगा। क्योंकि जो रिर्चस पेपर तैयार हुए हैं, उन पर कमेंट आने के बाद सब कुछ करीब करीब फाइनल हो जायेगा।

सवाल : वैश्विक महामारी के चलते आपके विचार में देश व प्रदेश की क्या स्थिति है।

जबाव : मुख्यमंत्री के निर्देशन में शासन व प्रशासन ने जो भी कदम उठाये हैं, उसके कारण ही कोरोना जैसी वैश्विक महामारी में जहां एक ओर विश्व के सक्षम देश जैसे अमेरिका, जर्मनी में हाहाकार मचा हुआ है और वहां मृत्युदर लगभग 6 प्रतिशत है। वहीं, हमारे देश में मृत्युदर लगभग 3 प्रतिशत है। उत्तर प्रदेश में स्थिति और भी बेहतर है, क्योंकि यहां पर मृत्युदर लगभग 2.2 प्रतिशत ही है। प्रवासी मजदूरों के आने के बाद भले ही बढ़ गया हो, लेकिन उससे पहले इस पर पूरी तरह से रोक की हुई थी। देश के एक नागरिक होने के नाते मेरा मानना है कि लॉकडाउन यदि खोला जाता है तो देश की अर्थव्यवस्था को गति मिलेगी और देश की विकास गति भी बढ़ेगी, लेकिन इसके साथ ही साथ हमें आत्मसंयम से काम लेना होगा और शासन व प्रशासन के निर्देशों को कड़ाई से पालन करना होगा।

सवाल : सैफई में कोविड 19 से निपटने के लिए क्या कदम उठाये गये हैं?

जबाव : इस महामारी से निपटन के लिए हमारे पास 200 बेड का कोविड हास्पिटल है। 600 बेड का क्वारंटाइन सेन्टर है। इसके अलावा हॉस्पिटल और सेन्टर के लिए अलग-अलग स्टाफ को लगाया गया है। जॉच, एक्सरे आदि की भी अलग से व्यवस्था की गई है। इसके अलावा अन्य रोगों के रोगियों का भी इलाज किया जा रहा है, परन्तु सावधानी के साथ जो रोगी हॉट स्पॉट से आ रहे हैं, उन्हे अलग वार्ड में रखा जा रहा है। उनकी जांच भी कराई जा रही है। इस तरह से हम इस महामारी से लड़ने के साथ ही साथ अन्य रोगियों का भी उपचार कर रहे हैं। इसके अलवा हमारे संस्थान द्वारा टेलीमेडिसिन के माध्यम से 11 विभागों के डाक्टरों द्वारा रोगियों को उपचार की सुविधा दी जा रही है। हमारे संस्थान में कोविड 19 की भी जॉच के लैब संचालित की जा रही है। जब हमें यह पता चला कि कोविड-19 नाम की बीमारी ने पूरे विश्व में तबाही मचा रखी है, तो हमने इसकी रोकथाम के लिए अध्ययन आरम्भ कर दिया और एक कमेटी का भी गठन किया जो कि इससे सम्बन्धित सभी पहलुओं पर अपनी निगाह बनाये रखेगी। सबसे पहले हमने यह अध्ययन किया कि कोरोना वायरस व्यक्ति के शरीर में किन-किन अंगों को प्रभावित करता है और क्या प्रभाव डालता है। फिर हमने आयुर्वेद की उन औषधियों का चुनाव किया, जो प्रभावित अंगों पर कार्य कर सकती है। संस्थान में अब तक 103 मरीज आ चुके है। उनमें 20 मरीजों का चिह्नित कर हमने यह दवा दी। इस शोध को आरम्भ करने से पहले हमने इससे संबधित सभी औपचारिकताओं को पूर्ण करते हुए उन्हे संकलित किया। मुझे यह बताते हुए खुशी हो रही है कि सभी चिह्नित 20 मरीज 5 से 7 दिनों में रोग मुक्त हो गये। मुझे लगता है कि हमने इस रोग की दवा खोज ली है।

सवाल : सैफई मेडिकल यूनिवर्सिटी में शोध की स्थिति क्या है?

जबाव : अभी हमारे द्वारा आरम्भिक शोध किया गया है और इसके बाद हम इस शोध को बड़े पैमाने पर करके इसके आकड़ों और प्रभावों का अध्ययन करेंगे। उससे यह पता चलेगा कि वास्तव में इसका कोरोना पर प्रभाव अच्छा है या नहीं। शोध के तीसरे स्तर पर हम इसका रैन्डमाइज्ड प्रयोग करेंगे। मतलब हम कुछ मरीजों को यह दवा देगें और कुछ को अन्य दवाओं के माध्यम से उपचारित करेंगे। जब इस शोध के अन्तिम चरण के आकड़ों और प्रभावों का अध्ययन करेंगे, जो शत-प्रतिशत सही होते हैं तो हमें पता चलेगा कि हमारे शोध किस दिशा में है। इसके साथ ही हम अपने शोध को शोध पत्रिका में प्रकाशन हेतु भेजेंगे, जिस पर विश्व के अन्य देशों के चिकित्सक और शोधकर्ता अपने अपने सुझाव देंगे। उससे हमें इसे और बेहतर बनाने में मदद मिलेगी।