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स्वस्थ्य जीवन चाहिए तो भारतीय परम्पराओं की ओर लौटना होगा
June 25, 2020 • Snigdha Verma • Social
शोभित विवि में अध्यात्म, योग एवं आयुर्वेद पर ऑनलाइन संवाद 
 शाहवेज खान
मेरठ। अध्यात्म, योग एवं आयुर्वेद विषय पर शोभित विश्वविद्यालय के अध्यात्म, अध्ययन एवं शोध केंद्र की ओर से ऑनलाइन संवाद कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इसमें देश-विदेश के विभिन्न विद्वान ने आध्यात्म, योग एवं आयुर्वेद विषय पर भारतीय परम्परा की श्रेष्ठता का उल्लेख करते हुए इन्हें जानने, समझने और अपनाने पर बल दिया। प्रयागराज से शंकराचार्य श्री ओंकारानंद सरस्वती ने कहा कि यदि जीवन में अध्यात्म न होता तो शुचिता न होती। शुचिता ही स्वस्थ जीवन का मूलमंत्र है। 
 
शंकराचार्य श्री ओंकारानंद सरस्वती ने कहा कि मनुष्य की दूषित वृत्तियों के कारण ही संसार पर कोरोना जैसा संकट आया है। मनुष्य की सात्विक वृत्तियों का पुरातन परिचय हमारी संस्कृति में मिलता है। कोराना वायरस ने लोगों को नियमित और संयमित किया है। मनुष्य को चाहिए कि प्रकृति शुद्धि के साथ-साथ आत्मशुद्धि पर भी बल दें। आध्यात्म सभी से प्रेम करना सिखाता है, यही हमारी भारतीय संस्कृति का मूल है।
 
अंतर्राष्ट्रीय योगाचार्य पद्मश्री भारत भूषण ने कहा कि कोरोना ने न केवल हमें हमारे पास आने का अवसर दिया है, बल्कि अपनी विद्या के पास आने का भी अवसर प्रदान किया है। हमारे तत्वदृष्टा ऋषियों ने हमारी जिन जीवन शैलियों का विकास किया था, स्वास्थ्य का राज उसी जीवन शैली में छिपा हुआ है। हम जीवन के शाश्वत सिद्धांतों को भूल गए हैं। आध्यात्म, योग और आयुर्वेद वास्तव में एक ही हैं। अध्यात्म के बिना योग सम्भव नहीं है। आयुर्वेद के बिना भी योग नहीं है। अध्यात्म आयुर्वेद की जड़ है। तीनों का संतुलन ही लाभदायक है।
 
शोभित विश्वविद्यालय के कुलाधिपति कुंवर शेखर विजेंद्र ने शोभित विश्वविद्यालय के अध्यात्म, योग और आयुर्वेद के क्षेत्र में किए जा रहे प्रयासों का वर्णन किया। उन्होंने कहा कि मनुष्य को योगी, सहयोगी और उपयोगी बनना आवश्यक है। हमें अपनी जड़ों को सींचना होगा। अध्यात्म, योग और आयुर्वेद को जानना-समझना बेहद आवश्यक है। उन्होंने कहा कि भारतीय परम्पराओं में क्वारंटाइन होना हमारे जीवन का हिस्सा रहा है, जिसे दुनिया आज जान रही है। हमें अपने ज्ञान को किसी दूसरे के माध्यम से जानने-समझने की गलती को सुधार करना होगा और अपने मूल ज्ञान को वहीं से समझना होगा। 
 
महामंडलेश्वर मार्तण्डपुरी ने कहा कि कोरोना ने हमें अपने  अंतर्मन, स्वजन और परमात्मा से जोड़ने का अवसर दिया है। योग परमात्मा से मिलने का पर्व है। उन्होंने कहा कि भारत देश नहीं बल्कि संदेश है। आयुर्वेद के विषय में उन्होंने कहा कि आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति से ऊपर उठकर जीवन पद्धति है। आज हमारे कष्टों का सबसे बड़ा कारण यह है कि हमारी अधिकांश चेतना शरीर और पेट की भूख तक सीमित रह गई है, मन, आत्मा और चित्त की भूख के प्रयास बेहद आवश्यक हैं। 
 
मारीशस से जुड़े न्यायमूर्ति राधामोहन ननकु ने कहा कि भारतीयों को चाहिए कि वे इस काल में अपनी परम्पराओं-ज्ञान को पहचानें। हमें विश्व को पुन: पढ़ाने और सिखाने का अवसर प्राप्त हुआ है। भारत विश्व को अपना कुटुम्ब मानता है। इस कुटुम्ब के कल्याण के लिए भारत को फिर से आगे आना होगा। उन्होंने जानकारी दी कि मारीशस में आयुर्वेद का इतना महत्व है कि हर जगह वैद्य मिल जाते हैं। शिवयोगी रघुवंश पुरी ने कहा कि योग को जन से जोड़ने के लिए सहज और सुगम बनाने की आवश्यकता है। अब समय है कि योग के साथ संगीत को आबद्ध किया जाए, ताकि प्रत्येक जन इससे जुड़ने का सरल  अवसर प्राप्त कर सके। आस्ट्रेलिया से जुड़ी अध्यात्मचेता मृदुल कीर्ति ने योग एवं श्रीकृष्ण पर छंदों का पाठ किया। कुरूक्षेत्र से जुड़े डॉ. शम्भू दयाल शर्मा ने कहा कि जीवन को बेहतर बनाने के लिए हमें दिनचर्या, ऋतुचर्या और रात्रिचर्या का पालन करना चाहिए। बंगलुरू से जुड़े योग गुरु सोहम ने कहा कि सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ सर्वप्रथम हमें अपने भीतर की नकारात्मकता को दूर करना होगा। 
 
इस अवसर पर शोभित विश्वविद्यालय में आयुर्वेद विभाग के सह-आचार्य डॉ. नमित कुमार और योगा एवं नेचुरोपैथी के प्रधानाचार्य डॉ. कपिल मोहन शर्मा ने कोरोना काल में विश्वविद्यालय के प्रयासों और भूमिका पर विचार रखे। विश्वविद्यालय के कुलाधिपति कुंवर शेखर विजेंद्र के धन्यवाद अभिभाषण के साथ संवाद कार्यक्रम सम्पन्न हुआ। संवाद कार्यक्रम का संचालन महामण्डलेश्वर मार्तण्डपुरी ने किया।