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विश्व कछुआ दिवस : कछुओं के लिए संजीवनी बना लॉकडाउन
May 22, 2020 • सुबोध कुमार • Environment
जल तंत्र के प्राकृतिक सफाईकर्मी होते हैं संरक्षण सूची में दर्ज कछुए 
 
इटावा। दुनियाभर में फैले कोरोना वायरस ने भले ही हर किसी को बुरी तरह से प्रभावित किया हो, लेकिन दुलर्भ कछुओं को बदले हुए हालात में संजीवनी मिल गई है। 
 
देहरादून स्थित भारतीय वन्य जीव संस्थान के संरक्षण अधिकारी डॉ. राजीव चौहान बताते हैं कि असल मे कोरोना वायरस के संक्रमण के बाद हुए लॉकडाउन ने हर प्रकार की गतिविधियों पर रोक लगा दी है। लेकिन, इसका फायदा उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान में पसरी राष्ट्रीय चंबल सेंचुरी और अन्य नदियों, तालाबों और झीलों में पाये जाने वाले दुलर्भ कछुओं को बड़ी तादाद में मिला है।
 
डॉ. राजीव चौहान ने बताया कि बाटागुर कछुआ, निलसोनिया गंगेटिका, निलसोनिया ह्यूरम, जियोक्लमस हेमिल्टनाई, पंगशुरा टेक्टा, लिसीमस पंक्टाटा, चित्रा इंडिका नामक कछुओं को अनुसूची प्रथम एवं पंचम में शामिल किया गया है। उन्होंने बताया कि दुनियाभर में फैले कोरोना संक्रमण के कारण हुए लॉकडाउन में कछुओं को दो प्रकार से फायदा पहुंचा है। जहां एक और इनका अवैध शिकार रुका है, वहीं दूसरी ओर इनके प्राकृतिक वास स्थलों को प्रजनन हेतु संरक्षण प्राप्त हुआ है। नदियों के आसपास बालू के किनारों एवं दीपों पर कछुए फरवरी से मार्च के बीच बालू में गड्ढा खोदकर अंडे देते हैं। लॉकडाउन के दौरान बालू के किनारों एवं द्वीपों पर मानव गतिविधियों के चलते इनके अंडों को नुकसान पहुंचता था। वह इस बार नहीं हो सका है। इससे काफी सारे घोसले बच गए। लॉकडाउन के कारण वाहनों का आवागमन बंद होने से जो अवैध रूप से कछुओं का शिकार कर पश्चिम बंगाल की ओर ले जाया जाता था, वह भी पूर्ण रूप से बंद रहा। क्योंकि स्थानीय स्तर पर कछुओं का व्यापार अमूमन नहीं होता है, इसलिए शिकारियों ने कछुओं को नुकसान नहीं पहुंचाया।
 
उन्होंने बताया कि इटावा, मैनपुरी, औरेया से काफी सारे ट्रक हर वर्ष पकड़े गए। दूसरी ओर अंतरराष्ट्रीय उड़ानें रद्द होने की वजह से पालतू कछुओं के रूप में रखने वाली प्रजातियां जिओक्लिमिस हैमिल्टनाई का भी व्यापार बंद होने की वजह से इनकी भी जान बच गई। इनका भी व्यापार यहां से होता देखा गया है। उन्होंने बताया कि भारत में पाई जाने वाली कछुओं की 29 प्रजातियों में से 15 उत्तर प्रदेश में पाई जाती हैं। इनमें से कुछ प्रजातियां भारतीय वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 के अंतर्गत संरक्षण प्राप्त है। ज्यादातर कछुए नदी, नाले, झील, तालाब इत्यादि में पाए जाते हैं। 
 
उत्तर प्रदेश के इटावा में बहने वाली नदियों, तालाबों और झीलों में 10 प्रजातियां पाई जाती हैं। इनमें सात संरक्षण सूची में दर्ज हैं। कछुए जल तंत्र के प्राकृतिक सफाईकर्मी माने जाते हैं। इसलिए उनका प्राकृतिक जल स्रोतों को स्वच्छ रखने में बहुत बड़ा योगदान है। कछुए शाकाहारी, मांसाहारी एवं सर्वहारी होते हैं। अलग-अलग प्रजातियों का अलग-अलग स्वभाव है। इनके नर्म कवच वाले कछुए एवं कठोर कवच वाले कछुए के दो प्रकार होते हैं।
 
उन्होंने बताया कि लॉकडाउन खुलने के साथ ही राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन की नमामि गंगे परियोजना के अंतर्गत भारतीय वन्यजीव संस्थान देहरादून की वैज्ञानिक रुचि बडोला एवं एसए हुसैन के नेतृत्व में गंगा बेसिन के अंतर्गत गंगा की सहायक नदियों में कछुओं के संरक्षण का कार्यक्रम आने वाले दिनों में यमुना, चंबल, केन, गोमती इत्यादि नदियों में भी संचालित किया जाएगा। अभी तक यह संरक्षण कार्यक्रम केवल गंगा नदी तक सीमित था। 
 
चंबल सेंचुरी के डीएफओ दिवाकर श्रीवास्तव कहते हैं कि इटावा में पांच नदियों का संगम होने के अलावा कई ऐसे बड़े तालाब हैं, जहां लाखों की तादाद में कछुए पाए जाते हैं। यही वजह है  ियहां कछुआ आसानी से मिल जाता है। यही वजह है कि यहां तस्कर सक्रिय रहते हैं। पांच नदियों के संगम वाले इलाके पंचनंदा और चंबल में कछुओं के दुश्मन भरे पड़े हैं।
 
इटावा परिक्षेत्र में कछुओं की तस्करी लंबे समय से जारी है। चंबल, यमुना, सिंधु, क्वारी और पहुज जैसी नदियों के अलावा अन्य छोटी नदियों और तालाबों से तस्कर कछुओं को पकड़ते हैं। 1979 में सरकार ने चंबल नदी के लगभग 425 किलोमीटर में फैले तट से सटे इलाके को राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य घोषित किया था। इसका मकसद घडियालों, कछुओं (गर्दन पर लाल व सफेद धारियों वाले कछुए) और गंगा में पाई जाने वाली डॉल्फिन का संरक्षण था। अभयारण्य की हद उत्तर प्रदेश के अलावा मध्य प्रदेश और राजस्थान तक है। इसमें से 635 वर्ग किलोमीटर आगरा और इटावा में है। इटावा परिक्षेत्र की नदियों में कछुओं की लगभग 55 जतियां पाई जाती हैं, जिनमें साल, चिकना, चितना, छतनहिया, रामानंदी, बाजठोंठी और सेवार आदि प्रसिद्ध हैं।
 
पर्यावरणीय संस्था सोसायटी फॉर कंजरवेशन ऑफ नेचर के सचिव संजीव चौहान  बताते हैं कि वैसे तो उनका संगठन स्थानीय वन विभाग से मिल करके कछुआ तस्करों के खिलाफ लगातार अभियान चलाते हैं, लेकिन इस लॉकडाउन के कारण कछुओ का शिकार और तस्करी करने वालों को कहीं जगह नहीं मिल सकी है। इसलिए कछुओं को संजीवनी मिली है। वैसे समान्यत: इटावा में एक किलो चिप्स का दाम 3,000 रुपये है। पश्चिम बंगाल पहुंचते-पहुंचते कीमत दस गुना तक पहुंच जाती है। उत्तर प्रदेश से कछुओं की सबसे ज्यादा सप्लाई पश्चिम बंगाल होती है। यहां से बांग्लादेश के रास्ते चीन, हांगकांग और थाईलैंड जैसे देशों में इन्हें बेचा जाता है।
 
माना जाता है कि कछुओं का मांस इंसानी पौरुष बढ़ाने की दवा का काम करता है। भारतीय कछुओं की खोल, मांस या फिर उसके बने चिप्स की मांग पूरी दुनिया में है। कुछ देशों में कछुए का मांस बहुत पसंद किया जाता है। कछुए के सूप और चिप्स को भी तरह से तरह से बनाकर परोसा जाता है।
डॉ. चौहान ने बताया कि लॉकडाउन के बाद अब बिल्कुल तस्वीर बदली हुई दिख रही है। कहा यह जा सकता है कि लॉकडाउन में कछुओ को जीवनदान दे दिया है।