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यदि मज़दूर अपने घर पर स्वयं रोज़गार पैदा करें तो पूंजीवादी घुटनों पर आ जाएंगे : कुमार प्रशांत
June 8, 2020 • एस.ज़ेड. मलिक • Social

भारत की गिरती आर्थिक दशा और दिशा पर एक संगोष्ठी

इस वर्तमान सरकार के नयी व्यावस्था ने 30 करोड़ नयें बेरोज़गार और पैदा किया 
  
नयी दिल्ली - पूर्वी दिल्ली के शकूरपुर  के स्कूल ब्लॉक अखंड हिंदुस्तान भवन लक्ष्मी नगर में भारत में गिरती आर्थिक दशा और दिशा पर एक संगोष्टी का आयोजन किया गया।  
 इस बैठ के अयोजक रोशन लाल अग्रवाल (चिंतक विश्लेषक लेखक आर्थिक न्याय ) ने भारत की गिरती अर्थ व्यवस्था और समाज में फैलते दुराग्रह पर अपनी चिंतन स्पष्ट करते हुए चर्चा  आरम्भ किया। उन्होंने वर्तमान सरकार की नीतिओं पर सवाल खड़ा करते हुए वर्तमान में  कोरोना काल में सरकार द्वारा लगाया गया अचानक से लोकडाउन के कारण समाज में उत्पन्न हुये भयावह स्थिति और देश में सारे व्यापार बंद होने कारण देश की अर्थ व्यावस्था पे इतना बुरा असर पड़ा की भारत की बढ़ती जीडीपी इतना निचे आ गया जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती है और सरकार अपनी नाकमिओं को छुपाने के लिए समाज में दुर्भावनापूर्ण दुराग्रह की स्थिति उत्पन्न कर देश के विकास की गति को रोक दया। इससे स्पष्ट है की सरकार पूर्ण रूप से मुट्ठी भर पूँजीपतिओं के दबाओ में काम कर रही है।   
   गरीब मज़दूर भुखमरी के कगार पर आ गए , मज़दूर 2000 किमी सड़कों पर पैदल चलने पर मजबूर हो गये की कोरोना वाइरस से जितनी मौतें नहीं हुयी उससे कहीं अधिक भूक के कारण और अपने गांव की और भूके पैदल प्रवास करने में  थकान से मौतें हुयी जिसके कारण आज समाज में इतनी भयावह दुर्दशा उत्पन्न हो गयी है कि जहाँ एक ओर कुछ लोगों द्वारा समाज में एक समुदाय के प्रति नफरत प्रयोजित किया जा रहा है वहीँ दूसरी और 3 महीने नियमित लोकडाउन के कारण बेरोज़गारी इतनी बढ़ी गयी जिससे गांव में भी कमज़ोर आदमी अपने आपको अपाहिज महसूस कर रहा है तथा अन्य युवा वर्ग अपराध की और अग्रसर हो रहे हैं। अब सवाल है ऐसे आर्थिक मंदी के कारण उत्पन्न हुयी बेरोज़गारी से जिस प्रकार आम आदमी का जीवन अस्त व्यस्त हो रहा उनका फिर से सामान्य स्थिति में कैसे लाया जाए ताकि फिर से जन-जीवन सुचारु रूप से स्थायी और स्थिर हो सके। समाज में बढ़ते दुर्भावनाओ और दुराग्रह के परिपेक्ष्य में अमीरी -गरीबी में सामन्यजस्य्ता कैसे बनायी जाये ? जिससे गरीबों की गरीबी दूर हो और अमीर गरीबों को अपने बराबरी में स्थान दें ? 

इस अवसर पर समाज के बड़े बुद्धिजीवी निष्ठावान चिंतक एवं विश्लेषक श्री कुमार प्रशांत जी(अध्यक्ष-गांधी प्रतिष्ठान नई दिल्ली) श्री किरण त्यागी(अध्यक्ष अखंड हिन्दुस्तान संस्थान), डॉ0 मित्तल(वरिष्ठ समाज सेवी), शिवा कांत गोरखपुरी(वोटर पार्टी ऑफ़ इंडिया के कोर्डिनेटर एवं वरिष्ठ समाज) श्री हरेंद्र सूर्यवंशी(चिंतक एवं विचारक आर्थिक न्याय संस्थान) , प्रो0 डॉ0 धर्मवीर सिंह(उर्दू विभाग-अंबेडकर विश्वविद्यालय दिल्ली), सैयद हसन अकबर,(चेयरमैन जनमानस सोसाइटी),एस. ज़ेड. मलिक(पत्रकार) विजय पांडे(युवा क्रांतिकारी समाज सेवक), सौरभ त्यागी(आईटी सेल आर्थिक न्याय संस्थान कोर्डिनेटर), गोपाल सिंह परिहार(समाज सेवी गौरक्षक दल एवं आर्थिक न्याय के समन्वयक) उपस्थित दर्ज कराते हुए रोशन लाल अग्रवाल के विश्लेषण पर अपने अपने विचार प्रस्तुत किया   ।  
 
इस अवसर पर सैयद हसन अकबर(अध्यक्ष-जनमानस सोसाइटी) ने अग्रवाल जी के विश्लेषण का समर्थन करते हुए कहा कि कोरोना से उत्पन्न स्थिति से जहां एक एक समाज त्रस्त है वही समाज में कुछ लोगों द्वारा नफ़रत का वातावरण प्रयोजीत कर समाज मे बहुत भयानक स्थिति बना कर आपसी सौहार्द भाई चार खराब करने की कोशिश की है जिसे समय रहते यदि नहीं रोका गया तो इसका आगामी बहुत गंभीर परिणाम देखने को मिल सकते हैं हमे आर्थिक विषमता को समाप्त करने के साथ साथ नफ़रत के दुर्गामी परिणाम को भी ध्यान में रखते हुए ठोस क़दम उठाने होंगे हम सरकार से अधिक अपेक्षा नहीं कर सकते, हमें स्वयं ही अपने स्तर से समाज में समन्वय बनाने की कोशिश करनी होगी।  
 
वहीं उपस्थित, प्रोफेसर धर्मवीर सिंह(उर्दू विभाग अंबेडकर विश्वविधालय-दिल्ली)  ने कहा, कोरोना महामारी के कारण हुए लॉक डाउन में जहां बेरोज़गारी की भयानक स्थिति पैदा की वहीं प्रयोजित मीडिया और सोशल मीडिया ने भी समाज में आपसी सौहार्द में बहुत ही व्यवस्थापित तरीक़े से विष घोलने का काम किया जिसके कारण आज की तिथि में समाज दलित पिछड़ी, हिन्दू, मुसलमान का भेद - भाव सब से अधिक देखने को मिल रहा है, जो बेरोज़गारी से अधिक भयानक है,जिससे समाज का हर व्यक्ति एक दूसरे से सशंकित है।  यदि हमारे आपसी सौहार्द भाईचारा स्थापित रहेगा तो हम आसानी से एक दूसरे के सहयोग से बेरोज़गारी समाप्त कर सकते चाहे सरकार हमारी मदद करे या न करे - हमारे अंदर ऐसी ऊर्जा है जो समाज को सुंदर और स्वस्थ्य बना सकते हैं। बशर्ते की आपसी भेद भाव मिटा दें।   

      शिवा कांत गोरखपुरी(वोटर पार्टी ऑफ़ इंडिया के कोर्डिनेटर एवं वरिष्ठ समाज सेवी)  ने अपने विचार प्रस्तुत करते हुए कहा हम व्यवस्था परिवर्तन को बात करते है? और यह ज़रूरी भी  है लेकिन सवाल  कैसे ? क्या इसके लिये सभी संगठनों को एक प्लेटफार्म पर संगठित करना अनभव है , जब तक सभी समाजिक संगठन एक प्लेटफार्म पर एक मत हो कर नहीं आते सामाजिक या आर्थिक परिवर्तन असंभव है, मेरा मत है की इसके लिए मतदाताओं को अधिकार जिस प्रकार वोट देना का अधिकार सैंवधानिक है उसी प्रकार अपने क्षेत्र मे काम न करने वाले प्रतिनिधिओं को भी मतदाताओं को हटाने का अधिकार मिलना चाहिए। तथा सरकार यदि एक क़ानून बना कर वोटर्स के लिए एक भारतीय नागरिक होने नाते उसे 6000 रुपया प्रतिमाह   को भी वोटरशीप के रूप में सरकार अदा करे। जब जनता द्वारा चने हुए प्रतिनिधिओं को सरकार साड़ी सुविधा प्रदान करती है तो मतदाताओं को वोटरशिप अमाउंट क्यूँ नहीं ? परिवर्तन के लिए हमे इस पर वह आवाज़ उठाने की आवश्यकता है।
  
 सौरभ त्यागी - (युवा विचारक एवं आईटी सेल आर्थिक न्याय संस्थान) ने अग्रवाल जी के विचारों का समर्थन करते हुए कहा की यदि हमारा समाज गरीबो को बराबरी से जीने का अधिकार दे दे तो सरे झगड़े ही समाप्त हो जाते हैं लेकिन ऐसा संभव नहीं है इसके लिए हमे गरीबों को समाज में सम्मान से जीने के लिए उन्हें समाजिक संस्थायें को ही मदद के लिए आना होगा हमें ग्रासरूट समन्यव्य का कार्य करना होगा। 

 हरेंद्र सूर्यवंशी(चिंतक एवं विचारक आर्थिक न्याय संस्थान) - ने सभी विचारकों के विचारों का समर्थन करते हुए कहा की सबसे  बड़ा झगड़ा धन का है। जबकि हमारे देश में धन की कमी नहीं है केवल विचारों, व्यवस्था तथा ईमानदारी की कमी है। हमारे देश में आपार धन है जिसका इस्तेमाल करने का आम जनता को अधिकार नहीं है जनता को केवल देने का सांवैधानिक अधिकार दिया गया है लेने का नहीं।  जनता को जागरूक करने की आवश्यकता है इसके लिए हमे ग्रामीण क्षत्रों से ज़मीनी स्तर पर नियमित लगनपूर्वक कार्य करने  आवश्यकता है। सरकार हमारे वोटरशिप का गलत इस्तेमाल कर रही है जब कि वोटर शिप संवैधानिक एक पिलर मान कर जनता को उसका अधिकार मिलना चाहिये।   

 किरण त्यागी(अध्यक्ष अखंड हिन्दुस्तान संस्थान) ने कहा की जहां धन की कमी है वही व्यवहार और विचार तथा सभ्यता, संस्कार भारत से लुप्त सी होते जा रही है  आज आवश्यकता है भारत के विशेष कर ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा को प्राथमिकता देना जो हम नहीं दे पा रहे है परिणामस्वरूप, आज स्थिति अभावग्रस्त होने के कारण अपराधीकरण एक विकराल रूप धारण कर लिया है जिसे  इतना आसान नहीं है हमे सर्व प्रथम रोज़गार शिक्षा को प्राथमिकता देना होगा, इसके लिए हमें कोई ठोस क़दम उठाना होगा। हर काम सरकार के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता।   
 
डॉ0 मित्तल(वरिष्ठ समाज सेवी), ने कहा की आज समाज से आर्थिक विषमता दूर होना चाहिए , उन्होंने कहा की करोना  को ले कर देश बहुत संकट में है। भुखमरी जैसी स्थितियाँ पैदा हुई है ,सरकार द्वारा सकल उत्पाद 20 लाख रु0 मुहैया कराएँ तो शायद गरीब मज़दूरों को राहत मिल की उम्मीद बन पायेगी और गरीब अपने क्षेत्र में ही उसे रोज़गार उत्पन्न कर  सकता है दूसरी और मेरा अंदाज़ है कि लगभग 30 करोड़ मज़दूर जो अपने घर वापस हुए है उन्हें सरकार मनरेगा की तर्ज़ दिहाड़ी दे कर रोज़गार मुहैया करा सकती है, तथा शहरों में भी ग्रामीण मनरेगा के तर्ज़ पर ही शहरी मनरेगा में रोज़गार गारंटी देना चाहिए। ताकि ऐसे आपदा के दौरान दिहाड़ी मज़दूरों को परेशानी का सामना न करना पड़े। इस समय स्थिति के अनुसार सरकार को चाहिए की हर व्यक्ति को काम की गारंटी दे और कम से कम 500 रू दिहाड़ी दी जिये। सरकार द्वारा प्रति व्यक्ति 2 लाख आये का साधन उपलब्ध कराना चाहिए तभी आम जनता की स्थिति में सुधार आ सकती है और 30 हज़ार महीने कीआमदनी वाले लोगों से प्रोपर्टी टेक्स वसूल किया जा सकता।  सरकार को इसके मुनाफे से सकल घरेलु उत्पाद  को बढ़ावा दे कर आर्थिक दिशा और दशा दोनों ही बदला जा सकता है। 
 
विजय पांडे(युवा क्रांतिकारी समाज सेवक) - ने अपना अनुभव के आधार पर बताया की इस समय गाँव और शहरों की स्थितियाँ अलग अलग हैं कोरोना काल के कारण छोटे और मंझोले किसानों की फसल, पर इतना बुरा असर पड़ा है की किसानो को आने वाले समय में बिना मदद के वह खेत को दुबारा जीवित कर ही नहीं सकते इस समय ग्रामीण क्षत्रों में छोटे और मंझोले किसानों जीवित रखने के लिए बिना ब्याज के सरकार उन्हें मदद करेगी तो तो ही वह जीवित रहते हुए दुबारा से अपने आपको मार्केट के योग बना सकते हैं।   
  
 कुमार प्रशांत (अध्यक्ष-गांधी प्रतिष्ठान नई दिल्ली) - ने सभी उपस्थिति विश्लेषकों के विचारों को सुनने के बाद कहा कहा ग़रीबी बढ़ी है और बढ़ेगी इस लिए की व्यवस्था बहुत ही कमज़ोर है इस कोरोना काल के महामारी में लॉक डाउन के दरमियान जो सरकार ने जो नयी व्यवस्था बनायी वह बहुत ही दयनीय और चिन्ताजनक  है।  सरकार के नए क़ानून ने भारत  की सम्पूर्ण व्यवस्था ही अस्त-व्यस्त कर दी लेकिन इनके हर नयी क़ानून से केवल और केवल गरीबों को ही मार पड़ा है ना की अन्य किसी विशेष लोगों को पूँजीपतिओं को इस समय भारत के सारे धन इकट्ठा करने को क़ानून के साथ अवसर दिया जा रहा है। जबकि इस वर्तमान सरकार दूसरे कार्यकाल ने अपने नए व्यावस्था में  30 करोड़ नयें बेरोज़गार और पैदा किया है। उन्होंने कहा की इस समय भारत  में दो प्रकार की शक्तियां काम कर रहीं हैं एक राजनितिक जिसकी बहुमत है दुसरा बड़े उधोगिक पूंजीपति ब्रोकर यही दो मिल कर सरकार चला रही है और जनता का ध्यान भटकाने के लिए सराकर अपने तीसरे  शक्ति का प्रयोग  करती है जिस समाज में न चाहते हुए भी नफरत लोग एक दूसरे से नफरत केर रहे है । और सरकार अपने सरकारी एजेंसीओ द्वारा कोरोना के चादर के नीचे राजनीति व्यवस्था तय कर रही  है।
 
 उन्होंने सुझाव देते हुए कहा की यदि इस समय जो मज़दूर अपने गांव चले गए हैं अब उन्हें शहर वापस ना आने दिया जाए तो फिर से गांव खुशहाल हो सकता है, गाँव मे ही अपनी नई व्यवस्था स्थापित कर सकते है, इसलिए की यही मज़दूर जब अपनी दिहाड़ी के लिए दूसरे के लिए उनकी नयी योजना को विकसित कर उन्हें उद्योग पति  योग बना देते हैं तो वही मज़दूर अपने राज्यों में अपने जिला में डीएम और उधोगिक आयुक्त के साथ मिल कर अपनी योजना क्यों नहीं सफल  कर सकते।  उन्हें तो केवल मार्गदर्शक की आवश्यकता है जो आप और हम कर सकते है हमे इस पहलु गंभीरता से विचार  कर  के अमल में लाना चाहिए इससे पूंजीवाद घुटनो के बल आ जाएंगे।  जिससे  सरकारी व्यवस्था ने गांव वापसी पर मजबूर कर दिया था  वही सरकार उनके पास चल कर गाँव मे आएगी और बाज़ार उनके पास चल कर उनके पास कदमो पर आएगा ? इस कोरोना काल में सरकार ने अपना हाँथ खड़ा कर लिया है। जबकि क्रोना क्या है - अभी एक भ्रम बना हुआ है।